शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

दावत-ए-रिन्दां

तुझे भुलाने के लिए ख़ुद को भूलना होगा,
दावत-ए-रिन्दां आज फ़िर क़ुबूलना होगा !

|||फ़राज़|||

दावत-ए-रिन्दां = Invitation of Drunk/Drunkard.

बुधवार, 27 सितंबर 2017

मुक़म्मल जहान !!!

ये हिक़ायत-ए-हस्ती तेरी
दुनिया में है मेहमान सी,
क्यूँ तलब रखता है तू
इस मुक़म्मल जहान की !

सुना है उसकी क़ब्र है
एक फ़क़ीर के बराबर में,
तामीर सोने चांदी की थी
जिस शख्स़ के मकान की !

वक़्त-ए-रुख़सत जिस्म ये
जायगा ख़ाली हाथ ही,
तब पैरवी ख़ुदा से करेगी
दौलत तेरे ईमान की !

सुन ज़रा जिंदा बशर,
कब्रगाहों से न डर,
मिट्टी में ही मिल जानी है
हस्ती हर इन्सान की !

तू भी तमन्ना करेगा
बेज़ुबान हो जाने की,
जो सज़ा मालूम हो तुझे
गीब़त-ओ-बोहतान की !

|||फ़राज़|||

हिक़ायत-ए-हस्ती= Story of the existence
तलब= Desire, Demand.
मुक़म्मल= Perfect, complete
फ़क़ीर= Mendicent, Dervish, Begger
तामीर= Construction.
वक़्त-ए-रुख़सत= Time of separation/ Parting.
पैरवी= Prosecution, Lobbying.
ईमान= Beliefe, Conscience, Creed, Faith
बशर= Human being.
कब्रगाह= Graveyard.
गीब़त= Back biting
बोहतान= False accusation, Calumny, False imputation.

बुधवार, 20 सितंबर 2017

नाज़-ओ-अंदाज़!!!

एक चाँद ने क़दम जो ज़मीं पर उतारे,
आसमान से शिक़ायत करने लगे सितारे !

मुसव्विर सा हूँ मैं डूबा दीदार में तेरे,
जलने लगे हैं तुझसे क़ुदरत के नज़ारे !

अंगड़ाई जो तूने ली तो मन लहराया सा है,
चाक जिगर होता है जो तू ज़ुल्फ़ संवारे !

नाज़-ओ-अंदाज़ जुदा तेरी हर अदा में हैं,
आजिज़ी भी यूँ सुनता है जैसे अहसान उतारे !

देखता भी यूँ है जैसे देखता ही न हो,
घायल से कर गए हैं मुझको तेरे इशारे !

तूफ़ान से लड़ने का शौक़ था तुझे 'फ़राज़',
बारहा घर बना लिया है समंदर के किनारे !

|||फ़राज़|||

मुसव्विर= Painter, Sculpturer, Photographer
क़ुदरत= Nature, The Universe.
चाक= Stil, Ton, Cut.
नाज़= Pride, Grace
अंदाज़= Mannerism.
आजिज़ी= Helplessness, Humility, Inability, Submissiveness.

मेरा साया!!!

तू मेरी सूनी आँखों को,
ख़्वाबों से रोज़ सजाता है !
मैले-धुंधले  मेरे मन को,
तू रंगों से भर जाता है !

जब रात अँधेरी घिरते ही,
मेरा साया खो जाता है !
तू चुपके से मन में आकर,
मेरे साया हो जाता है !

तू दूर हैं मेरी आँखों से,
पर दूर कभी न लगता है !
हमदर्द जो बनके आया तू,
आसान सा जीना लगता है !

जाने कैसा मरहम मुझको,
तेरी बातों से मिलता है !
उम्मीद के धागों से मेरे,
मन के ज़ख्मों को सिलता है !

न कोई वादा लेता है,
न शर्त कोई तू रखता है !
न बांधता है तू कसमों में,
न रिश्तों के बंधन रखता है !

तू दोस्त से ज़्यादा अपना है,
तू इश्क़ से ज़्यादा गहरा है !
मैं ख़ुद से ज़्यादा तेरा हूँ,
तू ख़ुद से ज़्यादा मेरा है !

|||फ़राज़|||

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

अशआर की हाज़िरी !!!

मेरी हस्ती को दरकार नहीं शीशों की,
रेज़ा-रेज़ा होकर मुझे शीशागरी आई है !

है ग़रज़ तो ले ले  तू मेरी ठोकरों से सबक़,
जा-ब-जा भटका हूँ तो मुझे रहबरी आई है !

बस यही पल हैं हक़ीकत, तू जी भर जी ले,
क्या ख़बर कौन सी सांस आखरी आई है !

फ़ुरसतें, आवारगी, और सब शौक़-ओ-जूनून,
आदतों के सौदे में हाथ ये नौकरी आई है !

चल के काँटों पे है मैंने हँसना सीखा,
हो के मिसमार तजुर्बों से मसख़री आई है !

तू क्यूँ हैरान होता है मेरी बेनियाज़ी पर,
तेरी बेरुख़ी से ही हमें ये ख़ुदसरी आई है !

तेरी सोहबत हुई तो इश्क़ को जाना हमने,
तेरी फ़ुरक़तों में हासिल ये शायरी आई है !

तू भी फ़राज़ के अल्फाज़ से हानत ले ले,
आज फ़िर मुझपर अशआर की हाज़िरी आई है !

|||
फ़राज़|||

दरकार= Need, Necessity.
रेज़ा-रेज़ा= Shattered.
शीशागरी= Glass making.
ग़रज़= Intention, Purpose, Object. 
जा-ब-जा= Everywhere
रहबरी= Guidance.
फ़ुरसत= Leisure.
आवारगी= Wandering, Waywardness.
शौक़= Ardour, Desires.
जूनून= Frenzy, Madness.
मिसमार- Demolished, Razed, Ruined.
मसख़री= Comedy, Funnyness.
बेनियाज़ी= Unconcern, Not being in any need.
बेरुख़ी= Ignorance, Indifference.
ख़ुदसरी= Obstinate, Stubbornness.
सोहबत= Association, Company.
फ़ुरक़त= Absences, Separation.
अल्फाज़= Words.
ज़हानत= Intelligence.
अशआर= Couplets.
हाज़िरी= Presence, Attendance.



बुधवार, 13 सितंबर 2017

बेनियाज़ !!!

बेनियाज़ जो तुझसे हम ज़रा हो गए,
इल्ज़ाम ये आया कि हम बेवफ़ा हो गए !

ख़ुदसे कोई शिक़ायत न रही बाक़ी,
जबसे तुझसे ही हम ख़फ़ा हो गए !

तेरे मसअले पर हम कुछ यूँ मिसाल हुए,
जीती जागती सी एक तालीमगाह हो गए !

हमें ही तो था इश्क़ उस जलती लौ से,
बरहा पतंगे की तरह हम फ़ना हो गए !

छुपा न पाएगी उन्हें कफ़न की चादर,
राज़-ए-ज़मीर जो तेरे बेरिदा हो गए !

उनका ख़ुदा शायद कोई और ही होगा,
क़त्ल करके जो लोग बेगुनाह हो गए !

कौन सुनाएगा तुझको अब कहानी मेरी,
अब तो मेरे क़ासिद भी बेजुबान हो गए !

चराग़ों की तरह रात हम भर जलते रहे,
मज़लूम-ए-तजाहुल हर सुबह हो गए !

|||फ़राज़|||


बेनियाज़= Independent, Carefree.
इल्ज़ाम= Blame
मसअला= Matter, Problem. 
मिसाल= Example, Instance, Model.
तालीमगाह= Seminary.
लौ= Candle flame, Ardent desire.
फ़ना= Destruction. 
राज़-ए-ज़मीर= Secret of Heart/Conscience/Mind.
बेरिदा=Uncover.
क़त्ल= Murder.
क़ासिद= Messenger.
मज़लूम= Victimised, One who is treated wrongfully or unjustly.
तजाहुल= Ignorance. 

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

मुख़्तसर!!!

तेरी कारसाज़ियों की सुनकर ख़बर आया हूँ,
ख़ुद की तलाश में आज मैं तेरे दर आया हूँ !

मुझको नहीं ख़्वाहिश तेरे दो जहान की,
आशियाने की तलाश में दर-ब-दर आया हूँ !

आज फ़िर दिल ने जो मयक़शी करना चाही,
रिंद बनकर आज फिर मैं तेरे दर आया हूँ !

तेरा अक्स भरम सा था नख़लिस्तान में,
ग़फ़लत में भटक कर मैं रहगुज़र आया हूँ !

तस्कीन शिफ़ा बनकर तेरी आँखों में रहती है,
अपनी आँखों से ख़ुद मैं पढ़ने ये खबर आया हूँ !

ये तो दिल है जो अपनी दवा ख़ुद ढूंढ लेता है,
मैं तेरी जानिब महज़ दिल की ज़िद पर आया हूँ !

अब क्या चढ़ाएगा कोई रंग ज़माना मुझपर,
रंगरेज़ के लबों को मैं लबों से छूकर आया हूँ !

सिर्फ सूरतें ही नहीं 'फ़राज़', सीरतें भी बदल गई ,
तू भी अधूरा आया, मैं भी मुख़्तसर आया हूँ !

|||फ़राज़|||

कारसाज़ी= Workmanship.
रिंद=Drankard.
नख़लिस्तान=Oasis
ग़फ़लत=Neglence.
तस्कीन= Comfort, Console.
शिफ़ा= Healing, Cure.
महज़= Only.
रंगरेज़= Dyre
जानिब= Towards.
मुख़्तसर= Concise, Insignificant, Abbreviated.

बुधवार, 6 सितंबर 2017

दिल के फ़रेब

रूबरू ख़ुद से मैं जिस पल हो गया,
एक पहेली सा था, मैं हल हो गया !

दिल के हर फ़रेब की किताबत की है,
कीमियागरी अब मेरा शग़ल हो गया !

जब भी तेरा नाम मेरी ज़ुबान पर आया,
मुख़ालिफ़ मेरे ये सारा शहर हो गया !

कुछ ठिकाने फ़िर कभी न आबाद हुए,
मेरे शहर से जब मैं शहर-बदर हो गया !

आना तो न था मुझे वापस तेरे दर पर ,
फ़क़त आदतन मुझसे ये अमल हो गया !

बिखरा सा था तू अब तलक ख़यालों में,
मैंने समेटा लिया तो तू ग़ज़ल हो गया !

|||फ़राज़|||

फ़रेब= Deception, Deceit.
किताबत= Correspondence.
कीमियागरी= Alchemy.
शग़ल= Hobby.
मुख़ालिफ़= Opposite, Enemy.
शहर-बदर= Outcasted, Exiled.
फ़क़त= merely, simply, only.
आदतन= Habitually.
अमल= Act.

सोमवार, 4 सितंबर 2017

इश्क-ए-कामिल!

एक रूह क़ैद है मेरे जिस्म की पिंजरे में,
ऐ ख़ुदा ये क्या अज़ीयत मुझपे नाज़िल है !
मेरी नाकामियां पढ़कर मुझे कहता क़ाबिल है,
हमने तो सुना था कि ज़माना बहुत फ़ाज़िल हैं !

ऐ मुश्किलों तुमसे हर बार जीत जाता हूँ,
मेरी निगाह में हरदम मेरी मंज़िल है !
तू भी आज अपने लहू की तासीर बता,
मेरी रगों में तो मेरे अल्फाज़ शामिल हैं !

बेक़रारियाँ, रतजगे, हूक सी दिल में है,
तेरी उम्मीद में इतना तो हमें हासिल है !
बारहा मेरे होश-ओ-हवास से भी तो तू जाता रहा,
फ़िर क्यूँ तेरे ख़्वाब से मेरी पलकें बोझिल हैं !

मेरे जनाज़े पर वो मेरा ही पता पूछता है,
बहुत ही मासूम सा वो मेरा क़ातिल है !
मेरे ज़िक्र पर अब भी वो चौंक सा जाता है,
नाक़ाम ही सही 'फ़राज़', इश्क तेरा कामिल है !

|||फ़राज़|||


नाज़िल= Descend.
फ़ाज़िल= Intelligent, wise, Expert.
तासीर=Effect, Influence, Impression.
होश-ओ-हवास= All Conciousness and Sense.
कामिल= Perfect.

शनिवार, 2 सितंबर 2017

रिहाई बेज़ुबान की !!!

मैं नहीं जानता दास्ताँ 
पिंजरे में क़ैद उस परिंदे की
मगर दिल है बाख़बर
उस बेज़ुबान के दर्द से !

एक काग़ज़ के टुकड़े के बदले
एक परिंदे को आज़ाद कर देना !

रिहाई बेज़ुबान की
इबादत है ख़ुदा की !!!

|||फ़राज़|||

सोमवार, 28 अगस्त 2017

ग़ज़ल-ए-फ़राज़!!!

मुब्तिला क्यूँ रहता हैं मन मुनाफ़ाखोरी में,
ख़ुदग़र्ज़ियाँ छुपी रहती हैं मन की दराज़ में !

मुद्दतों तलक ख़लाओं में भटकता रहा हूँ,
ख़ुद को पाया है मैंने अपने ही अल्फ़ाज़ में !

ज़ुल्म देखकर भी खिड़कियाँ बंद कर लेते हैं,
रवादारी नहीं बाक़ी इस शहर के मिजाज़ में !

एक ही माटी के पुतले तो सभी इंसान हैं,
थोड़े सच्चे, थोड़े झूठे, अपने ही अंदाज़ में !

वो बेख़बर शोर कहता है सदा-ए-रूहानी को,
क्या ख़ुदा बसता नहीं मौसिक़ी-ओ-साज़ में !

तू परिंदा है ग़ाफ़िल, शाम को लौटना होगा,
मत भूल ज़मीं तू अपनी ऊंची परवाज़ में !

बहुत ख़ुशनसीब हूँ कि हुनरमंद हूँ मैं,
दोस्त मिलते हैं मुझे हर दिलनवाज़ में !

तुझको भी ज़िन्दगी से कुछ तो गिला है,
ख़ुद को ढूंढता है तू ग़ज़ल-ए-फ़राज़ में !

|||फ़राज़|||

मुब्तिला= Afflicted.
मुनाफ़ाखोरी=Profiteer
ख़ुदग़र्ज़ी= selfishness.
दराज़= Drawer
ख़ला=Space, Hollow.
रवादारी=Leniency
मिजाज़=Nature
सदा-ए-रूहानी= Spiritual/God's Call
मौसिक़ी-ओ-साज़=Music and Instrument.
ग़ाफ़िल= Neglectful
परवाज़= Flight.
दिलनवाज़= Kind, Benevolent.

रविवार, 27 अगस्त 2017

बेमुरव्वत!!!

बेमुरव्वत मैं भी ज़रा हो जाऊं,
क्यूँ न अब मैं भी ख़फ़ा हो जाऊं!

तू बेनियाज़ है अब मेरी मरीज़ी से,
बेग़रज़ मैं तुझसे इस दफ़ा हो जाऊं!

तुझसा कोई हुनर मुझको भी अता हो,
क़त्ल भी करूँ और बेगुनाह हो जाऊं!

तेरे क़िरदार का हर ऐब नुमाया होगा,
सर-ए-बाज़ार अगर मैं बेरिदा हो जाऊं!

वो तग़ाफ़ुल न करेगा ख़बर है हमको,
'फ़राज़' किसके लिए मैं फ़ना हो जाऊं!

मेरे ऐब को भी लोग मेरी अदा समझें,
मुकम्मल मैं कुछ इस तरह हो जाऊं!

क़फ़स में तो हूँ मगर परिंदा तो नहीं,
मैं बाज़ुबां हूँ तो कैसे बेज़ुबां हो जाऊं!

|||फ़राज़|||

बेमुरव्वत=Unkind, Uncivil, Inhuman.
बेनियाज़= Carefree
मरीज़ी= Sickness, Unwell.
बेग़रज़=Uninterested.
अता= Gift, Giving
क़िरदार= Character
ऐब=Defect, Imperfection
नुमाया= Apparent, Visible.
सर-ए-बाज़ार= In public, Openly.
बेरिदा=Uncover
तग़ाफ़ुल=Negligence
फ़ना=Destroy
क़फ़स=Cage, Prison
बाज़ुबां= One who can speak
बेज़ुबां= Speechless, Voiceless

बुधवार, 23 अगस्त 2017

मन!!!

मन किस माया में उलझा है,
ये कैसे ख़्वाब सजाता है,
है मन में इतना शोर सा क्यूँ,
जब कानों में फ़िर सन्नाटा है !

हर रात भटकता जोगी सा,
मन चाँद की हसरत रखता है,
हर रात मलामत करता है,
हर रात सफ़र दोहराता है !

मन बारिश भी, मन सहरा भी,
मन दलदल भी, मन दरिया भी,
मन झील सा ठहरा रहता है,
जब मौज उठे, बह जाता है !

जिस्म-ए-फ़ानी पर इतराकर,
मन ख़ुद ही ख़ुद को छलता है!
ख़ुद का पैग़म्बर बनकर,
मिट्टी का ख़ुदा पछताता है !

ख़ुद अपने दो हिस्से करके,
मन ख़ुद से राज़ छुपाता है,
मन ख़ुद ही बुत को गढ़ता है,
ख़ुद ही बुत से घबराता है !

मन क्यूँ कठपुतली जैसा है,
दुनियादारी के बंधन में,
मैं तोड़ता हूँ बंदिश जितनी,
मन उतना नाच नचाता है !!!

|||फ़राज़|||

माया= Illusion
जोगी= Gypsy, Nomad, Hermit, Ascetic.
सहरा= Desert, Wilderness
मलामत= Reproach, Rebuke.
मौज= Wave
जिस्म-ए-फ़ानी= Mortal body.
पैग़म्बर= Prophet.
बुत= Idol
कठपुतली= Puppet
बंदिश= Closure, Stoppage.

सोमवार, 21 अगस्त 2017

ख़ुदा!!

उसे मकानों में न ढूंढ
कि वो मकीं में मिलेगा,
आसमानवाला है वो
लेकिन ज़मीं पे मिलेगा !

क्यूँ तलाशता है ख़ुदा को
तू इबादतगाहों में,
वो बेशक्ल है लेकिन
हर आदमी में मिलेगा !

जाने कैसी ये हमाहमी
ये शोर उसके नाम का,
उसे तन्हाई में पुकार ले
वो ख़ामोशी में मिलेगा !

ख़ुदा ही जाने हक़ीकत
जन्नत-ओ-दोज़ख़ की,
तुझे तेरी करनी का सिला
इसी ज़िन्दगी में मिलेगा !

बहुत नाज़ है तुझे 
अपने इल्म पर ऐ ग़ाफ़िल,
वो बेज़रूरत है फ़राज़
वो बेख़ुदी में मिलेगा !

गर हो सके तो
किसीका ग़मख़्वार हो जा,
इबादत का अस्ल मज़ा
तुझे चाराग़री में मिलेगा !

|||फ़राज़|||

मकीं= Resident, Inhabitant.
इबादतगाह= A place of worship, A mosque, A temple, A church.
बेशक्ल= Faceless, The divine energy, God.
हमाहमी= Hustle-Bustle
जन्नत-ओ-दोज़ख़Heaven and Hell.
सिला= Reward.
नाज़= Pride.
इल्म= Knowledge, Learning.
ग़ाफ़िल= Negligent, Neglectful
बेज़रूरत = Without need.
बेख़ुदी= Intoxication
ग़मख़्वार= Consoler, Sympathizer, Comforter.
इबादत= Worship, Prayer, Adoration.

चाराग़री= Curing, Remedial

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

नसीहत !!!

वो लूट लेता है दिल के अमीरों को,
धड़कनों के ख़र्च में किफ़ायत रखना !

बड़ी बेबाक़ियाँ हैं उन दो निगाहों में,
दिल-ए-नादाँ की ज़रा हिफाज़त रखना !

नज़र तो नज़र है, बदल भी सकती है,
उधार के ख़्वाबों की न हसरत रखना !

कोई लौटा नहीं कभी इश्क़ की राहों से,
हुस्न वालों से तू न कोई रग़बत रखना !

आग के दरिया में उतरने वाले सुन ले,
याद तू दानिश्वरों की नसीहत रखना !

हर मोड़ पर घेर लेंगे तुझे इल्ज़ामदराज़,
उसकी गलियों से न कोई सोहबत रखना !

|||फ़राज़|||

किफ़ायत= Parsimony
बेबाक़ियाँ= Boldness
रग़बत= Inclination, Wish, Interest
दानिश्वर= Learned, Wise, Sagacious.
इल्ज़ामदराज़= Blamers.










रविवार, 13 अगस्त 2017

तेरे शहरवाले !!!

अजब रिवायतें रखते हैं तेरे शहरवाले,
ज़हर सस्ता और महंगी दवा रखते हैं!

ज़ाहिराना तो रखते हैं अदब-ओ-लिहाज़,
रंजिशें दिल में, और होंठों पे दुआ रखते हैं!

इल्ज़ामदराज़ियाँ करते हैं वो पीठ पीछे,
सामने वो लोग मीठी सी ज़बां रखते हैं!

तेरे नाम से आवाज़ देते हैं मुझको अक्सर,
कुछ लोग मेरे ज़ख्मों को हरा रखते हैं!

अब तो तू भी हो गया है उनके ही जैसा,
लोग नफ़रत अब मुझसे बे-वजह रखते हैं!

जब भी गुज़रता है तेरी गली से ''फ़राज़,
लोग तेरी खिड़की पर निगाह रखते हैं!

|||फ़राज़|||


अजब= strange
रिवायत= traditions
ज़ाहिरन= apparently, overtly
अदब-ओ-लिहाज़respect, modesty
रंजिशें
इल्ज़ामदराज़ियाँ
ज़बां
बे-वजह
निगाह

वजह!!!

यूँ तो रोने को ग़म हज़ार हैं ज़माने में,
हंसने के लिए बस एक वजह बहुत है!

आ जाओ कि बसा लें हम एक दुनिया,
मेरे दिल में ख़ाली सी जगह बहुत है!

दिल है कि तेरी ही इबादत करता है,
यूँ तो इस ज़माने में ख़ुदा बहुत हैं!

लाख रंजिशें रख लें मुझसे दुनिया वाले,
दोस्त के दिल की एक दुआ बहुत है!

तुझसे जीत कर मैं कुछ न पाऊंगा,
तुझसे हार जाने में नफ़ा बहुत है!

जाने क्यूँ बस दिल को सज़ा मिलती है,
यूँ तो निगाहों के भी तो गुनाह बहुत है!

क़फ़स उन निगाहों की पुरमसर्रत हैं,
हसीन ये क़ैद की सज़ा बहुत है!

पलकें उठाने से वो घबराता है 'फ़राज़',
सुना है उसकी आँखों में हया बहुत है!

|||फ़राज़|||

क़फ़स= Prison, पुरमसर्रत= Full of happiness

बुधवार, 9 अगस्त 2017

ज़िद!!!

डूब कर तो देख तू ख़ुद में
तुझको किनारा मिल जायगा !
अपनी तलाश में निकल तो सही
तुझको जहान सारा मिल जायगा !

तेरी ज़िद से ही गुज़रते हैं
तेरे जूनून के सब रास्ते,
तू गौर से तो देख ज़रा
मंज़िल का इशारा मिल जायगा !

महसूस कर हर जलन को
तू जल के नूर हो जा,
ज़िन्दगी की अलसुबह का
पुरनूर नज़ारा मिल जायगा !

इकलौता चाँद फ़लक का
सबको तो न मयस्सर होगा,
तुझको भी तेरे नसीब का
रौशन सितारा मिल जायगा !

कभी फ़ुर्सत से पलटना
तुम र्क़ मुझ बशर के,
मेरी हंसी की परतों में 
एक दर्द का मारा मिल जायगा !

वक़्त ने बदल दी हैं 'फ़राज़'
हमारी सूरतें और सीरतें ,
फ़ासला अब कम न होगा
अगरचे तू दोबारा मिल जायगा !

||| फ़राज़ |||

सोमवार, 7 अगस्त 2017

तू मेरी बहन है !!!


कभी मेरी दोस्त बन कर
हर राज़ बाँट लेती हो !
कभी माँ की तरह
मुझको डांट लेती हो !

कभी छोटी-छोटी बातों पर
तुम मुझसे लड़ती हो !
कभी पंख मुझे दे देती हो
कभी साथ मेरे तुम उड़ती हो !

कभी मेरे होमवर्क के
सारे सवाल सुलझाती थी !
अब भी मेरी हर एक उलझन
अपनेपन से सुलझाती हो !

मेरी हंसी में हंसती हो
मेरे ग़म में उदास रहती हो !
फ़ासला बस निगाह का है
हमेशा दिल के पास रहती हो !

ज़िन्दगी की दुश्वारियों में
मुझको इतना तो चैन है !
ख़ुदा मुझसे ख़फ़ा नहीं है
क्योंकि तू मेरी बहन है !!!

|||
फ़राज़ |||

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

सफ़र-ओ-क़याम

मंज़र भी बदल जाते हैं
रंग-ए-चट्टान बदल जाता है !
वक़्त जब करवट लेता है
तो हर इन्सान बदल जाता है !

एक उम्र से मुसाफ़िर हूँ
दरबदर  सच की तलाश में,
कभी मेरा ख़ुदा बदल जाता है
कभी मेरा ईमान बदल जाता है !

हर बार नए एक ज़हर से 
वो मुझको आज़माता है !
जब पीना सीख जाता हूँ तो
वो मेरा जाम बदल जाता है !

हर हमसफ़र करता है वादा
हर क़दम साथ निभाने का,
किसीका सफ़र बदल जाते हैं
किसीका क़याम बदल जाता है !

चिट्ठियां अब भी मिलती हैं
डाकिया अब भी इधर आता है,
तेरी उँगलियों की लिखावट में 
हर बार तेरा पैग़ाम बदल जाता है !

बहुत नाज़ था हमको वफ़ाओं पर
कि अब यकीं करें भी तो कैसे,
सुना है तेरी महफ़िल में अक्सर
तेरा मेहमान बदल जाता है !

वो नादान अपनी ख़ुदी में चूर है
ज़माने की रिवायतें नहीं जानता, 
जब फूल मुरझा जाता है 'फ़राज़'
तो उसका दाम बदल जाता है !

|||फ़राज़|||

क़याम= stay
ख़ुदी= egotism, pride, self-respect

सोमवार, 31 जुलाई 2017

बरबादियाँ !!!

हक़ीकत-ए-हस्ती अपनी
मैं तुझसे बयां करता हूँ,
हार जाता हूँ जब ख़ुद से
तो गुनाह करता हूँ मैं !

तू भी पाक दामन नहीं
ऐब तुझमे भी हैं बेशक़,
बारहा तेरी पर्देदारियों का 
एहतराम करता हूँ मैं !

मेरी लकीरों में थी आवारगी
तो तुझे इल्ज़ाम क्या दूँ,
खेल  लकीरों का ही था,
चल एतराफ़ करता हूँ मैं !

पूज कर उस पत्थर को
मैंने ही ख़ुदा कर डाला,
बरबादियों का कुछ यूँ
इन्तिज़ाम करता हूँ मैं !

शायद तू फ़िर से कभी
सब छोड़ के आ जाये,
शिक़ायतें, हसरतें, किस्से,
सब एहतिमाम रखता हूँ !

रेत के साथ मिट गए
तेरे क़दमों के सारे निशां, 
राह के पत्थरों से अब भी
दुआ सलाम करता हूँ मैं !!!

|||फ़राज़|||

बुधवार, 26 जुलाई 2017

पुरवाई !!!

लगता है छू कर आई है मेरे घर को,
बड़ी हमदर्द सी मुझे आज हवा लगती है !

छू के यूँ गुज़री के हर ज़ख्म भर गया,
पुरवाई में शामिल माँ की दुआ लगती है !

कल ख़्वाब में घर था और घर में मैं,
ख़ुशग़वार मुझे आज की सुबह लगती है !

फ़िज़ा में बहती है वहां ख़ुशबुएँ रिश्तों की,
रूह को तस्कीन सी घर की हवा लगती है !

जिस ज़मीं पे बने थे मेरे पहले क़दम,
वो दर-ओ-दीवार मुझे रहनुमा सी लगती है !

झांक कर देखा तेरी पलकों के दरवाज़ों में,
तेरी दुनिया मेरे ख़्वाबों का मकां लगती है !

दिन ढलने का बहाना करके चली जाती है,
शब्-ए-तन्हाई, तू भी महबूबा सी लगती है !

मेरी तरबियत, मेरी तहज़ीब का आईना है,
बहुत मीठी सी मुझे उर्दू जुबां लगती है !

||| फ़राज़ |||

ख़ुशग़वार=Pleasent, Congenial.
फ़िज़ा= Breeze
तस्कीन= Comfort, Soothing.
शब्-ए-तन्हाई=Night of Loneliness.
तरबियत= Education, Training,
तहज़ीब= Culture.



सोमवार, 24 जुलाई 2017

जूनून !!!

तेरा हर ख़्वाब हो जायेगा हक़ीकत
जूनून पर अपने तू यकीन कर ले !

अपनी ज़िद के पंख फैलाकर तो देख
परवाज़ से आसमान को ज़मीं कर ले !

बनके सूरज तू सारा जहाँ मुनव्वर कर
बनके चाँद अमावास को चांदनी कर दे !

उससे हारेगा तो सब जीत जायेगा तू
किसी रूठे यार से फ़िर दोस्ती कर ले !

माँ कहती हैं कि ख़ुदा सुनता है दुआओं को
माँ की भी सुन ले, ख़ुदा की भी बंदगी कर ले !

तुझसा भी कोई हिस्सास तो होगा ज़माने में 
कोई हमख़याल मिल जाये तो हमनशीं कर ले !

ज़माने की हमा-हामी ख़त्म न होगी ता-क़यामत
जहाँ दिल लग जाए तेरा, क़याम वहीँ कर ले !

तेरा नाम भी लिख जायेगा तारीख़ों में ''फ़राज़
अपनी सोहबत से तू आदमी को आदमी कर दे !

||| फ़राज़ |||

परवाज़= Flight, Rising. 
मुनव्वर= Illuminated, Enlightened,
बंदगी= Worship, Devotion
हिस्सास= Sensitive. 
हमनशीं= Companion, Associate.
हमा-हामी= Bragging, Boasting, Tall talk.
ता-क़यामत= Up to dooms day.
क़याम= Stay.
तारीख़= Date, History.