मेरी हस्ती को दरकार नहीं शीशों की,
रेज़ा-रेज़ा होकर मुझे शीशागरी आई है !
है ग़रज़ तो ले ले तू मेरी ठोकरों से सबक़,
जा-ब-जा भटका हूँ
तो मुझे रहबरी आई है !
बस यही पल हैं हक़ीकत, तू जी भर जी ले,
क्या ख़बर कौन सी सांस आखरी आई है !
फ़ुरसतें, आवारगी, और सब शौक़-ओ-जूनून,
आदतों के सौदे में हाथ ये नौकरी आई है !
चल के काँटों पे है मैंने हँसना सीखा,
हो के मिसमार तजुर्बों से मसख़री आई है !
तू क्यूँ हैरान होता है मेरी बेनियाज़ी पर,
तेरी बेरुख़ी से ही हमें ये ख़ुदसरी आई है !
तेरी सोहबत हुई तो इश्क़ को जाना
हमने,
तेरी फ़ुरक़तों में हासिल
ये शायरी आई है !
तू भी फ़राज़ के अल्फाज़ से ज़हानत ले ले,
आज फ़िर मुझपर अशआर की हाज़िरी आई है !
|||फ़राज़|||
दरकार= Need,
Necessity.
रेज़ा-रेज़ा= Shattered.
शीशागरी= Glass
making.
ग़रज़= Intention,
Purpose, Object.
जा-ब-जा= Everywhere
रहबरी= Guidance.
फ़ुरसत= Leisure.
आवारगी= Wandering,
Waywardness.
शौक़= Ardour,
Desires.
जूनून= Frenzy,
Madness.
मिसमार- Demolished,
Razed, Ruined.
मसख़री= Comedy,
Funnyness.
बेनियाज़ी=
Unconcern, Not being in any need.
बेरुख़ी= Ignorance,
Indifference.
ख़ुदसरी= Obstinate,
Stubbornness.
सोहबत= Association,
Company.
फ़ुरक़त= Absences,
Separation.
अल्फाज़= Words.
ज़हानत= Intelligence.
अशआर= Couplets.
हाज़िरी= Presence,
Attendance.