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शनिवार, 3 मार्च 2018

!!! ज़िन्दगी !!!

ज़िन्दगी, तू इतनी क्यूँ ख़फ़ा हो गई,
कि दर्द ही दर्द की दवा हो गई !

चल अब मौत से इश्क़ करके देखें,
ज़िन्दगी तो आदतन बेवफ़ा हो गई !

तेरे मुख़्तसर से ख़याल में डूबे हुए,
आज फ़िर रात से सुबह हो गई !

जलने की ज़िद तो पतंगे ने की थी,
बदनाम तो बेवजह ही शमा हो गई !

ख़ुदारा तूने इतनी अक़्ल क्यूँ दे दी,
देख तेरी ये मख़्लूक़ आप ख़ुदा हो गई !

आज माँ के चेहरे पर एक सुकून देखा,
अदा नमाज़ और क़ुबूल दुआ हो गई !

जब मेरे यार ने मुझे गले लगाया,
कि मेरे हर मर्ज़ की शिफ़ा हो गई !

मेरी बेगुनाही की दलील सिर्फ़ इतनी है,
मैं भी इन्सान हूँ, मुझसे भी ख़ता हो गई !

ख़ुद पे यक़ीन रखके मैं आगे बढ़ता रहा,
'फ़राज़मुकम्मल हर एक दुआ हो गई !

||| फ़राज़ |||

ख़फ़ा= Displeased, Angry
आदतन= Habitually
बेवफ़ा= Faithless, Treacherous
मुख़्तसर= Concise, Short, Brief
ख़याल= Thought
ज़िद= Insistence
पतंगा= Moth
बदनाम= Defame, Malign
बेवजह= Without reason
शमा= Candle
ख़ुदारा= God
अक़्ल= Wisdom, Brain, Knowledge
मख़्लूक़= Creation
आप= Self
सुकून= Peace
नमाज़= prayer (especially as prescribed by the Muslim law)
क़ुबूल= Accept
दुआ= benediction
मर्ज़= Sickness, Illness
शिफ़ा= Cure, Healing
बेगुनाही= Innocence
दलील= Argument
ख़ता= Mistake, Fault
ख़ुद= Self, Oneself
यक़ीन= Trust, Confidence
मुकम्मल= Complete



रविवार, 27 अगस्त 2017

बेमुरव्वत!!!

बेमुरव्वत मैं भी ज़रा हो जाऊं,
क्यूँ न अब मैं भी ख़फ़ा हो जाऊं!

तू बेनियाज़ है अब मेरी मरीज़ी से,
बेग़रज़ मैं तुझसे इस दफ़ा हो जाऊं!

तुझसा कोई हुनर मुझको भी अता हो,
क़त्ल भी करूँ और बेगुनाह हो जाऊं!

तेरे क़िरदार का हर ऐब नुमाया होगा,
सर-ए-बाज़ार अगर मैं बेरिदा हो जाऊं!

वो तग़ाफ़ुल न करेगा ख़बर है हमको,
'फ़राज़' किसके लिए मैं फ़ना हो जाऊं!

मेरे ऐब को भी लोग मेरी अदा समझें,
मुकम्मल मैं कुछ इस तरह हो जाऊं!

क़फ़स में तो हूँ मगर परिंदा तो नहीं,
मैं बाज़ुबां हूँ तो कैसे बेज़ुबां हो जाऊं!

|||फ़राज़|||

बेमुरव्वत=Unkind, Uncivil, Inhuman.
बेनियाज़= Carefree
मरीज़ी= Sickness, Unwell.
बेग़रज़=Uninterested.
अता= Gift, Giving
क़िरदार= Character
ऐब=Defect, Imperfection
नुमाया= Apparent, Visible.
सर-ए-बाज़ार= In public, Openly.
बेरिदा=Uncover
तग़ाफ़ुल=Negligence
फ़ना=Destroy
क़फ़स=Cage, Prison
बाज़ुबां= One who can speak
बेज़ुबां= Speechless, Voiceless

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

फ़िर आज तुम नहीं हो !

एक ख़्वाब फ़िर जला है
फ़िर नींद है ख़फ़ा सी,
फ़िर आज रतजगा है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

फ़िर आज चाँद तन्हा
गुमसुम सा ढल गया है,
फ़िर रात बेवजह है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

मासूम सी तमन्ना 
फ़िर थक के सो गई है,
फ़िर ज़ख्म जागता है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

फ़िर अब्र घिर के आये
फ़िर हम न भीग पाए,
एक प्यास बेपनाह है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

फिर धड़कनों की लय पर
तेरा ही सिलसिला है,
दिल को यही गिला है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

||| फ़राज़ |||