गुरुवार, 23 मार्च 2023

इश्क़


जिसको जितना मिला, उतना मिस्कीन है,

अपने ग़म में ज़माना ही ग़मगीन है!

 

दोगे जो भी इसे, तुमको लौटाएगा,

इश्क़ इज़्ज़त भी है, इश्क़ तौहीन है!

 

जिसको जैसे मिले, उसको वैसा करे,

इश्क़ रहमान है, इश्क़ फ़ित्तीन है!

 

एक के साथ दूजा चला आएगा,

इश्क़ तक़लीफ़ है, इश्क़ तस्कीन है!

 

बात तेरी नहीं, तू परेशाँ न हो,

दिल तो बस आदतन यूँही ग़मगीन है!

 

याद मीठी है लेकिन है क्या माजरा,

आँख का पानी जाने क्यूँ नमकीन है!

 

मामला ये है कि याद वो आ गया,

मामला आज ज़्यादा ही संगीन है!

 

जानते हैं कि अल्लाह कोई और है,

आशिक़ों के लिए इश्क़ ही दीन है!

 

आप जो भी कहें फ़र्ज़ ‘अल्फ़ाज़’ पर,

आप जो भी कहें उसपे आमीन है!

||| अल्फ़ाज़ |||


मिस्कीन = Poor, निर्धन, ग़रीब

ग़मगीन = Depressed, दुखी

तौहीन = Insult, अपमान

परेशाँ = Distressed, Bothered, चिंतित

रहमान = Merciful, दयालु

फ़ित्तीन = Mischievous, Sinner, बुराई डालने वाला, पापी

तस्कीन = Ease, Comfort,  चैन, सुख

संगीन = Tough, Serious, असाधारण, कठिन

माजरा = Happening, Narration, मामला, विषय

दीन = Religion, धर्म

फ़र्ज़ = Duty, कर्तव्य

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