साहिल पे ला के हमको यूँ तिश्ना न कीजिये,
ढलती है रात अब तो पर्दा न कीजिये !
तिश्नगी दीदार की बढ़ जाएगी, सुनिए,
चेहरा हथेलियों में छुपाया न कीजिये !
ऐसी भी क्या नज़र के मैं ईमान से जाऊँ,
यूँ मद-भरी निगाह से देखा न कीजिये !
जीते जी आप हमको मारा न कीजिये,
बिखरी हुई ये ज़ुल्फ़ संवारा न कीजिये !
है क्या ख़बर कि सच में मेरी जाँ चली जाये,
झूठी कसम यूँ जान की खाया न कीजिये !
किसको ख़बर कि कौन सा लम्हा है आख़िरी,
छोटी सी ज़िन्दगी है, रूठा ना कीजिये !
किस किस से बैर लें, किस किस से हम लड़ें,
यूँ बे-नक़ाब हो के निकला न कीजिये !
रुक रुक के जाँ निकलती है ‘अल्फ़ाज़’ की जानाँ,
हंस हंस के यूँ ग़ैरों से तो बोला न कीजिये !
||| अल्फ़ाज़ |||
तिश्नगी= Thirst, Longing
दीदार= Appearance, Sight, Seeing
ईमान= Belief, Conscience, Creed, Faith
मद-भरी= Full Of Intoxication, Ecstasy, Wantonness, Lust
ज़ुल्फ़= A Curling Lock (Of Hair)Hanging Over The Temple Or
Ear, Tresses
जाँ= Life, Soul
बैर= Enmity, Hostility
बे-नक़ाब= Unveiled
ग़ैर= Stranger, Outsider
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