सोमवार, 3 अप्रैल 2017

फ़िर आज तुम नहीं हो !

एक ख़्वाब फ़िर जला है
फ़िर नींद है ख़फ़ा सी,
फ़िर आज रतजगा है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

फ़िर आज चाँद तन्हा
गुमसुम सा ढल गया है,
फ़िर रात बेवजह है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

मासूम सी तमन्ना 
फ़िर थक के सो गई है,
फ़िर ज़ख्म जागता है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

फ़िर अब्र घिर के आये
फ़िर हम न भीग पाए,
एक प्यास बेपनाह है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

फिर धड़कनों की लय पर
तेरा ही सिलसिला है,
दिल को यही गिला है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

||| फ़राज़ |||

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