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शनिवार, 26 मई 2018

तो हमको चैन पड़े !!!

वो फ़िर बुलाएँ तो हमको चैन पड़े,
पर हम न जाएँ तो हमको चैन पड़े !

यूँ तो रूठ कर सुकून ज़्यादा है,
पर वो मनाएँ तो हमको चैन पड़े !

उनके चेहरे पे नदामत हो और,
हम मुस्कुराएँ तो हमको चैन पड़े !

मेरे सवालों पे पशेमां हो के,
वो आँसू बहाएं तो हमें चैन पड़े !

वो रोएँ हमसे लिपट कर के और,
हमको भी रुलाएँ तो हमको चैन पड़े !

ज़माना बेवफ़ा कहता है उनको,
वो ख़ुद बताएँ तो हमको चैन पड़े !

उनकी वफ़ा को भी बेवफ़ाई से,
कोई आज़माये तो हमको चैन पड़े !

उनसे भी कोई वादे करके,
न निभाये तो हमें चैन पड़े !

जिसे वो चाहते हैं वही उनका,
दिल दुखाए तो हमको चैन पड़े !

काश यूँ हो कि कोई उनको भी,
छोड़ जाए तो हमको चैन पड़े !

हमसे नहीं तो हमारी ग़ज़ल से ही,
वो दिल लगाएँ तो हमको चैन पड़े !

उनकी ही तरह हम भी उनको,
भूल जाएँ तो हमको चैन पड़े !

शायद तमन्ना अब भी यही दिल में है,
कि वो लौट आएँ तो हमको चैन पड़े !

'फ़राज़' ये जीतने वाले हमसे,
हार जाएँ तो हमको चैन पड़े !

||| फ़राज़ |||


चैन= Comfort, Ease, Happiness, Peace
सुकून= Peace, Rest, Tranquility
नदामत= Regret, Repentance, Shame
पशेमां= Embarrassed/ Penitent
बेवफ़ा= Faithless, Treacherous
वफ़ा= Fidelity, Faithful
शायद= Perhaps
तमन्ना= Wish, Desire, Inclination, Request

बुधवार, 27 सितंबर 2017

मुक़म्मल जहान !!!

ये हिक़ायत-ए-हस्ती तेरी
दुनिया में है मेहमान सी,
क्यूँ तलब रखता है तू
इस मुक़म्मल जहान की !

सुना है उसकी क़ब्र है
एक फ़क़ीर के बराबर में,
तामीर सोने चांदी की थी
जिस शख्स़ के मकान की !

वक़्त-ए-रुख़सत जिस्म ये
जायगा ख़ाली हाथ ही,
तब पैरवी ख़ुदा से करेगी
दौलत तेरे ईमान की !

सुन ज़रा जिंदा बशर,
कब्रगाहों से न डर,
मिट्टी में ही मिल जानी है
हस्ती हर इन्सान की !

तू भी तमन्ना करेगा
बेज़ुबान हो जाने की,
जो सज़ा मालूम हो तुझे
गीब़त-ओ-बोहतान की !

|||फ़राज़|||

हिक़ायत-ए-हस्ती= Story of the existence
तलब= Desire, Demand.
मुक़म्मल= Perfect, complete
फ़क़ीर= Mendicent, Dervish, Begger
तामीर= Construction.
वक़्त-ए-रुख़सत= Time of separation/ Parting.
पैरवी= Prosecution, Lobbying.
ईमान= Beliefe, Conscience, Creed, Faith
बशर= Human being.
कब्रगाह= Graveyard.
गीब़त= Back biting
बोहतान= False accusation, Calumny, False imputation.

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

फ़िर आज तुम नहीं हो !

एक ख़्वाब फ़िर जला है
फ़िर नींद है ख़फ़ा सी,
फ़िर आज रतजगा है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

फ़िर आज चाँद तन्हा
गुमसुम सा ढल गया है,
फ़िर रात बेवजह है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

मासूम सी तमन्ना 
फ़िर थक के सो गई है,
फ़िर ज़ख्म जागता है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

फ़िर अब्र घिर के आये
फ़िर हम न भीग पाए,
एक प्यास बेपनाह है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

फिर धड़कनों की लय पर
तेरा ही सिलसिला है,
दिल को यही गिला है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

||| फ़राज़ |||

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

जब वो मनाने आया

वो आज अपनी कहानी सुनाने आया,
पथरायी आँखों को पानी बनाने आया !

कोई वादा न कोई कसम निभाने आया,
वो जब भी आया तो छोड़ जाने आया !

एक आस के सहारे हम जिंदा थे अब तलक,
वो आया भी तो क़दमों के निशान मिटाने आया !

रोज़ जलाता हूँ मैं ख़्वाब अँधेरा मिटाने के लिए,
मेरे जलते ख़्वाबों को वो कभी ना बुझाने आया !

फ़िर एक तमन्ना की, फ़िर बेज़ार हो गए,
वो फ़िर से आया तो मुझे छोड़ जाने आया !

शायद उसने आने में बहुत देर लगा दी होगी,
कोई रिश्ता न बचा था जब वो मनाने आया !

फ़राज़.....

बुधवार, 28 सितंबर 2016

और फ़िर तन्हाई...

रात है, चाँद है, और फ़िर तन्हाई,
रात चराग़ों में फ़िर जली हो जैसे !
ये तेरी आहट, कि बढ़ गयी धड़कन,
ये तेरा साया, कि तू मिली हो जैसे !

दिल में तक़लीफ़ सी जगी हो जैसे,
याद फ़िर सीने में चुभी हो जैसे,
ये ख़याल फ़िर तेरे न होने का,
चोट कोई फ़िर छिल गई हो जैसे !

इतनी क़ुर्बत कि हर पल की ख़बर रहती थी,
इतनी दूरी कि कोई दुश्मनी हो गई हो जैसे,
बात करती है तो बस ज़ख्म देती है,
देखती यूँ है कि कोई अजनबी हो जैसे !

है क्या दीवानगी, ये तमन्ना धुंधली सी,
उसके आने की कोई आस बची हो जैसे !
वक़्त-ए-रुख़सत तूने मुड़कर न देखा पीछे...
ज़िन्दगी साथ मेरा छोड़ चली हो जैसे...

|||फराज़|||