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शनिवार, 9 दिसंबर 2017

चराग़ाँ !!!

सर-ए-शाम मैं बैठा हूँ चराग़ाँ करके, 
चले भी आओ कि कहीं रात न ढल जाये !

अपनी हथेली की हिना में मेरा नाम लिख लो,
नज़र का क्या है, कौन जाने कब बदल जाये !

अपनी धड़कनों पर इख़्तियार मुझको दे दो,
इससे पहले कि ये ज़माना कोई चाल चल जाये !

ये तन्हाइयां डराती हैं, कुछ 
तो जतन करो,
अब चले भी आओ कि हर बला टल जाये !

लम्हे जो मुट्ठी में हैं, आओ इन्हें मिलके जी लें,
रेत की तरह हाथ से लम्हें न फिसल जाये !

तसव्वुर-ए-यार को अभी ग़ज़ल कर दे 'फ़राज़'
इससे पहले कि दिल की कैफ़ियत बदल जाये !


                                                     |||फ़राज़|||


सर-ए-शाम= About evening time, evening.

चराग़ाँ= Display of lamps, Lighting.
हिना= Henna, Myrtle.
इख़्तियार= Authority, Controle, Influence.
जतन= Effort.
तसव्वुर-ए-यार= Thought/ Imagination of Beloved/Friend.
कैफ़ियत= Circumstances, Condition, Situation.

शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

इंतज़ार !!!

माना कि ये प्यार नहीं, कुछ और है,
दिल तेरा इंतज़ार फ़िर भी करता क्यूँ है !

दिल जानता है कि तेरी तलाश ख़सारे होंगे,
दिल तेरी गली से फ़िर भी गुज़रता क्यूँ है !

कभी चाँद ने देखा था वस्ल दो सितारों का,
मैं तो ग़र्दिश में हूँ मगर चाँद भटकता क्यूँ है !

तू तो छत पर सिर्फ़ मेरे लिए आता था,
तो अब भी चाँद रातों में निकलता क्यूँ है !

मेरे ज़िक्र पर वो अब भी चौंक जाता है,
ऐसा करता है, तो वो ऐसा करता क्यूँ है !

उसकी आँखों में अब कोई और बस गया है,
तू अभी तक उसके लिए संवारता क्यूँ है !

तू दिल्लगी ही कह देता इस रब्त को,
मोहब्बत को तू बदनाम करता क्यूँ है !

ज़हन को भी वो छू गया होगा 'फ़राज़',

हर इल्ज़ाम दिल पर ही धरता क्यूँ है !

|||फ़राज़|||


ख़सारे= Losses

वस्ल= Meeting, Union.
ग़र्दिश= Misfortune, Circulation, Rotation.
ज़िक्र= Narration, Remembrance, Talk.
रब्त= Connection, Relation, Bond, Intimacy.
ज़हन= Mind.
इल्ज़ाम= Blame

बुधवार, 23 अगस्त 2017

मन!!!

मन किस माया में उलझा है,
ये कैसे ख़्वाब सजाता है,
है मन में इतना शोर सा क्यूँ,
जब कानों में फ़िर सन्नाटा है !

हर रात भटकता जोगी सा,
मन चाँद की हसरत रखता है,
हर रात मलामत करता है,
हर रात सफ़र दोहराता है !

मन बारिश भी, मन सहरा भी,
मन दलदल भी, मन दरिया भी,
मन झील सा ठहरा रहता है,
जब मौज उठे, बह जाता है !

जिस्म-ए-फ़ानी पर इतराकर,
मन ख़ुद ही ख़ुद को छलता है!
ख़ुद का पैग़म्बर बनकर,
मिट्टी का ख़ुदा पछताता है !

ख़ुद अपने दो हिस्से करके,
मन ख़ुद से राज़ छुपाता है,
मन ख़ुद ही बुत को गढ़ता है,
ख़ुद ही बुत से घबराता है !

मन क्यूँ कठपुतली जैसा है,
दुनियादारी के बंधन में,
मैं तोड़ता हूँ बंदिश जितनी,
मन उतना नाच नचाता है !!!

|||फ़राज़|||

माया= Illusion
जोगी= Gypsy, Nomad, Hermit, Ascetic.
सहरा= Desert, Wilderness
मलामत= Reproach, Rebuke.
मौज= Wave
जिस्म-ए-फ़ानी= Mortal body.
पैग़म्बर= Prophet.
बुत= Idol
कठपुतली= Puppet
बंदिश= Closure, Stoppage.

रविवार, 23 अप्रैल 2017

फ़िक्र !!!

यूँ तो मेरे भी इर्द-गिर्द
हमदर्द-ओ-ग़मख़्वार हैं
तू हाल मेरा पूछ ले,
ये जहाँ मुझसे जल जाए !

आरज़ू के दो दिनों में
हमने गुज़ारी उम्र है
हसरतों की रात ये,
यूँ ही कहीं न ढल जाए !

चल सितारों में ही अब
कर लें कहीं हम आशियाँ,
इससे पहले कि ज़माना
फ़िर चाल कोई चल जाए !

पहलू में आ गए हो तो
ख़ामोशियों को तोड़ दो
शर्म-ओ-हया में फ़िर कहीं,
ये रात भी न ढल जाए !

तेरी वफ़ाओं पर यकीं,
यूँ तो बहुत ऐ यार है,
डर है मुझे कि दिल कहीं
तेरा न फ़िर संभल जाए !

||| फ़राज़ |||

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

कश्तियाँ काग़ज़ की !!!

डूब ही जाती हैं कश्तियाँ काग़ज़ की
हर बार ख़तायें लहरें नहीं करतीं !

वो हुनरमंद था जो किनारे पर रहा
हम उतरे थे दरिया, मगर पार न हुए !

कुछ सितारे चमकते हैं अमावास रातों में
मेरे दिल में किसी रात अँधेरा नहीं होता !

रोज़ बावक़्त मिलने चले आते हैं
रुख़ फेरते नहीं सितारे इन्सान की तरह !

तमाम उम्र बेवजह भी नहीं गुज़री ‘फ़राज़’
एक दौर में कोई तेरा अपना भी था !


||| फ़राज़ |||

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

जब आप बुलाया करते थे !

जब शाम ढले तारे तकते,
एक सोच में डूबे रहते थे !
उसके फ़ितूर में अलसाये,
हम रात से सुबह करते थे !

जब नाम को तेरे दोहराते,
एक नींद से बैर लिया हमने !
और जागी-जागी आँखों से,
हम ख़्वाब सजाया करते थे !

एक उम्र में लाखों लम्हें हैं,
जब आप पुकारा करते था !
हर सरहद तब थी बेमानी,
जब आप बुलाया करते थे !

एक वक़्त भी ऐसा आया था,
जब हमसे उनको निस्बत थी !
जो ख़्वाब थे मेरी नज़रों में,
वो उनके दिल की मन्नत थी !

जब छुप के दुनियावालों से,
वो चाँद फ़लक़ पर आता था !
हम मुंडेरों के पीछे से ,
हर शाम नज़ारा करते थे !

तब जलने में भी ठंडक थी,
जब आप सताया करते थे !
बेवजह अक्सर रूठे हम,
      जब आप मनाया करते थे !

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

फ़िर कभी !

तुम ख़्वाब बन के आओ
आँखों में आज रात
इस रात की सुबह को
ढूंढेंगे फ़िर कभी !

बाद मुद्दत उलझा है
तेरी ज़ुल्फ़ से ख़याल,
मेरी उलझनों की गिरहें
खोलेंगे फ़िर कभी !

तू चाँद बनके रात में
आया है फ़लक़ पर,
भर लें तुझे निगाह में
सो लेंगे फ़िर कभी !

बस आज की रात है
कुछ देर ठहर जाओ,
छोड़ जाने का इरादा
कर लेंगे फ़िर कभी !

रह जाओ आग़ोश में ज़रा 
की मिल जाये तसल्ली,
दुश्वारियों का तक़ाज़ा
कर लेंगे फ़िर कभी !

भर लूँ तुझे निगाह में
कल की किसे ख़बर,
इन लम्हों का तजुर्बा
बाँटेंगे फ़िर कभी !

क्या गिला तुझसे करूँ
छोटी सी है ज़िन्दगी,
तेरी नादानियों का शिक़वा
कर लेंगे फ़िर कभी !

|||फ़राज़|||

मुद्दत= A long time, 

गिरहें= A knot, joint, knuckle.
फ़लक़= Sky, Heaven, Firmament.
आग़ोश= Embrace
दुश्वारियों= Difficulties.
तक़ाज़ा= Demand, Pressing Settlement, Urge.
तजुर्बा= Experience.
गिला= Complaint, Reproach
शिक़वा= Complaint


रविवार, 25 दिसंबर 2016

एक ख़्वाब का सौदा !!!

हर रात मैं अपनी नींदों से
एक ख़्वाब का सौदा करता हूँ !
है ख़्वाब, तो टूट ही जाना है
पर नींदें ख़र्चा करता हूँ !

तू बनके ख़्वाब सिरहाने पर
तकिये पर अक्सर मिलता है !
हौले-हौले थपकी देकर
तू दूर कहीं ले जाता है !

जहाँ वक़्त के धागे लम्हों को
बंधन में बाँध नहीं पाते !
जहाँ उम्र थमी है बरसों से
जहाँ साथ थी भीगी बरसातें !

कुछ लम्हे जो थे ख़्वाब हुए
अब ख़्वाब में अक्सर मिलते हैं !
एक हसरत की सूरत बनकर
अहसास से बनकर मिलते हैं !

चादर पर सिलवट के जैसा तू
मन में सिलवट दे जाता है !
पलकों की मुंडेरों को तू
फिर से तर कर जाता है !

हर रात मैं अपनी नींदों से
एक ख़्वाब का सौदा करता हूँ !
है ख़्वाब, तो टूट ही जाना है
पर नींदें ख़र्चा करता हूँ !


|||फ़राज़|||

शनिवार, 19 नवंबर 2016

महरूमियत


आज फ़िर यूँही गुज़रा मैं जो बीते कल से,
रूह को बाक़ी तेरी महरूमियत आज भी है !
काश यूँ भी होता की साथ तू भी होता,
एक दबी-दबी सी हसरत आज भी है !

तेरे ख़याल पर कुछ ठहर सा जाता हूँ,
एक पहले सी मेरी फ़ितरत आज भी है !
रात, चाँद, सितारे और तन्हाई भी है,
और साथ मेरे फ़ुरक़त आज भी है !

कुछ देर चाँद दिखा और फिर छुप गया,
तुझ जैसी इसकी आदत आज भी है !
बस रात और ख़ामोशियाँ ही रहे फ़िर बाक़ी,
बस इतनी ही मेरी सोहबत आज भी है

तू ख़्वाब में आया, फ़िर न नींद आई,
हर रात की सी हालत आज भी है !
चल भूल ही जाते हैं ‘फ़राज़’ उसको
बाक़ी बस यही सूरत आज भी है !

बुधवार, 28 सितंबर 2016

और फ़िर तन्हाई...

रात है, चाँद है, और फ़िर तन्हाई,
रात चराग़ों में फ़िर जली हो जैसे !
ये तेरी आहट, कि बढ़ गयी धड़कन,
ये तेरा साया, कि तू मिली हो जैसे !

दिल में तक़लीफ़ सी जगी हो जैसे,
याद फ़िर सीने में चुभी हो जैसे,
ये ख़याल फ़िर तेरे न होने का,
चोट कोई फ़िर छिल गई हो जैसे !

इतनी क़ुर्बत कि हर पल की ख़बर रहती थी,
इतनी दूरी कि कोई दुश्मनी हो गई हो जैसे,
बात करती है तो बस ज़ख्म देती है,
देखती यूँ है कि कोई अजनबी हो जैसे !

है क्या दीवानगी, ये तमन्ना धुंधली सी,
उसके आने की कोई आस बची हो जैसे !
वक़्त-ए-रुख़सत तूने मुड़कर न देखा पीछे...
ज़िन्दगी साथ मेरा छोड़ चली हो जैसे...

|||फराज़|||