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शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

यक़ीं

जीतना है अगरहार से तू न डर,
ख़ुद पे रख तू यक़ीं, और बस कर गुज़र !

जो है लम्हा अभीइसको जी भर के जी,
ये ही लम्हा है जिसमें है सारी उमर !

फ़िर ये मौक़ा दोबारा मिले न मिले,
जब भी मौक़ा मिलेख़ुद को साबित तू कर !

अड़चनें कोई  भी न नज़र आएँगी,
गर हमेशा रहे मंज़िलों पर नज़र !

तोड़ दे सरहदेंतू भी हद से गुज़र,
सब पढ़ें ग़ौर सेबन तू ऐसी ख़बर !

क्या हुआ वो अगर तुझको ठुकरा गया,
और हैं मंज़िलेंऔर भी हैं सफ़र !

शर्तिया साथ कुछ भी नहीं जाएगा,
ज़िन्दगी कर मुसाफ़िर की तरह बसर !

शे' लिख कर के 'अल्फ़ाज़ने की दुआ,
जाऊँ हँसता हुआरोए सारा शहर !

||| अल्फ़ाज़ |||

यक़ीं= Trust, Faith, Belief, Confidence
उमर (उम्र) = Age, Life, The Span Of Life
मौक़ा= Opportunity, Chance, 
साबित= Prove
अड़चन= Obstacle 
गर= If              
सरहदें= Boundaries, Borders
हद= Limit, Boundary
ग़ौर= Deep Thought, Reflection, Deliberation
शर्तिया= Surely, Certainly, Undoubtedly
मुसाफ़िर= Traveler, Passenger
बसर= Pass, Spend, Live
शे'र= Verse, Couplet

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

वतन के जाँ-निसार

कोई मज़हब नहीं होता शहीदों की मज़ारों का,
कोई मज़हब नहीं होता वतन के जाँ-निसारों का,

मज़हब को पूछकर गोली सरहद पे नहीं चलती,
कोई मज़हब नहीं होता सरहद के पहरेदारों का !

||| फ़राज़ |||

मज़हब= Religion
शहीद= Martyr
मज़ार= Shrine, Tomb
वतन= Country, Abode
जाँ-निसार= Devoted, Fervent, One Who Sacrifices His Life For Others.
सरहद= Border
पहरेदार= Sentinel, Watchman.

मंगलवार, 13 मार्च 2018

कौन ???

बे-वजह किसीके लिए अब मुस्कुराता कौन है ?
भटके हुए को रास्ता अब दिखलाता कौन है ?

इंसान तो अब इंसान के भी काम नहीं आता,
परिंदों को आजकल पानी पिलाता कौन है ?

इंसानियत को हिस्से में बांटने वाली,
ज़मीन पर ये लकीरें बिछाता कौन है ?

सरहद के पार सब दुश्मन ही रहते हैं,
अफ़वाह दोनों ही तरफ ये फैलाता कौन है ?

लोग तो एक पल में रिश्ते भुला देते हैं,
रंजिशें कभी मगर भूल पाता कौन है ?

जिस ख़ुदा को तेरा क़ानून मानता ही नहीं,
उसकी कसम मेरे क़ातिल को खिलाता कौन है ?

मेरा आक़ीदा है तो इबादत करता हूँ,
नज़र से ख़ुदा को देख पाता कौन है ?

दाढ़ी पहचान हो गई दहशतगर्दी की,
इस्लाम की ये तस्वीर बनाता कौन है ?

सुना है 'फ़राज़' कि अच्छे दिन आयेंगे,
इस बार ये लतीफ़ा सुनाता कौन है ?

|||
फ़राज़ |||

बे-वजह= Without cause, 
परिंदे= Birds
इंसानियत= Humanity
लकीर= Line, Streak
सरहद= Border, Boundary
अफ़वाह= Rumor
रंजिश= Enmity, ill-will/ hostility
क़ातिल= Murderer
आक़ीदा= Faith, Fundamental Doctrine of Belief, Tenet
इबादत= Prayers, Adoration
दाढ़ी= Beard
दहशतगर्दी= Terrorism,
इस्लाम= The religion of the Muslims
लतीफ़ा= Joke

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

रिवायतें

मन की मुंडेरों पर लगे
कांच के टूटे टुकड़े जैसी
रस्में और रिवायतें
रोकती हैं सरहदें लांघने से !
जो चुभता है
उसे निकाल देना चाहिए !

हादसों से तजरबा लेते हैं,
हुनर बेचने वाले
हस्ती नहीं बेचा करते !!!

| फ़राज़ |

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

जब आप बुलाया करते थे !

जब शाम ढले तारे तकते,
एक सोच में डूबे रहते थे !
उसके फ़ितूर में अलसाये,
हम रात से सुबह करते थे !

जब नाम को तेरे दोहराते,
एक नींद से बैर लिया हमने !
और जागी-जागी आँखों से,
हम ख़्वाब सजाया करते थे !

एक उम्र में लाखों लम्हें हैं,
जब आप पुकारा करते था !
हर सरहद तब थी बेमानी,
जब आप बुलाया करते थे !

एक वक़्त भी ऐसा आया था,
जब हमसे उनको निस्बत थी !
जो ख़्वाब थे मेरी नज़रों में,
वो उनके दिल की मन्नत थी !

जब छुप के दुनियावालों से,
वो चाँद फ़लक़ पर आता था !
हम मुंडेरों के पीछे से ,
हर शाम नज़ारा करते थे !

तब जलने में भी ठंडक थी,
जब आप सताया करते थे !
बेवजह अक्सर रूठे हम,
      जब आप मनाया करते थे !