क्यूँ
कहता है महंगाई है,
अब
भी सस्ती अच्छाई है !
अब भी सस्ता है मुस्काना,
अब भी सस्ता है मुस्काना,
अब
भी सस्ती तो भलाई है !
हो अह्ल-ए-नज़र, तुम क्या जानो,
हो अह्ल-ए-नज़र, तुम क्या जानो,
कितनी
महँगी बीनाई है !
दुनिया की दौलत न माने,
दुनिया की दौलत न माने,
कितनी
महंगी सच्चाई है !
महसूस करो इसको छू कर,
अब
भी सस्ती पुरवाई है !
सौ नाज़ उठा के हासिल है,
सौ नाज़ उठा के हासिल है,
कितनी
महंगी अंगड़ाई है!
जिस भीड़ में न कोई अपना,
जिस भीड़ में न कोई अपना,
उससे बेहतर तन्हाई है !
हर रोज़ हूँ बिकता सस्ते हैं,
हर रोज़ हूँ बिकता सस्ते हैं,
कितनी
महँगी ये कमाई है !
क़ानून की क़ीमत है सस्ती,
क़ानून की क़ीमत है सस्ती,
महँगी
'अल्फ़ाज़' रिहाई है !
||| अल्फ़ाज़ |||
||| अल्फ़ाज़ |||
अह्ल-ए-नज़र= People Of Vision
बीनाई= Vision, Eye-Sight
नाज़= Pride,
Grace, Tantrum
हासिल=
Gain
बेहतर= Better
क़ानून= Law,
Ordinance, Rule