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मंगलवार, 13 मार्च 2018

कौन ???

बे-वजह किसीके लिए अब मुस्कुराता कौन है ?
भटके हुए को रास्ता अब दिखलाता कौन है ?

इंसान तो अब इंसान के भी काम नहीं आता,
परिंदों को आजकल पानी पिलाता कौन है ?

इंसानियत को हिस्से में बांटने वाली,
ज़मीन पर ये लकीरें बिछाता कौन है ?

सरहद के पार सब दुश्मन ही रहते हैं,
अफ़वाह दोनों ही तरफ ये फैलाता कौन है ?

लोग तो एक पल में रिश्ते भुला देते हैं,
रंजिशें कभी मगर भूल पाता कौन है ?

जिस ख़ुदा को तेरा क़ानून मानता ही नहीं,
उसकी कसम मेरे क़ातिल को खिलाता कौन है ?

मेरा आक़ीदा है तो इबादत करता हूँ,
नज़र से ख़ुदा को देख पाता कौन है ?

दाढ़ी पहचान हो गई दहशतगर्दी की,
इस्लाम की ये तस्वीर बनाता कौन है ?

सुना है 'फ़राज़' कि अच्छे दिन आयेंगे,
इस बार ये लतीफ़ा सुनाता कौन है ?

|||
फ़राज़ |||

बे-वजह= Without cause, 
परिंदे= Birds
इंसानियत= Humanity
लकीर= Line, Streak
सरहद= Border, Boundary
अफ़वाह= Rumor
रंजिश= Enmity, ill-will/ hostility
क़ातिल= Murderer
आक़ीदा= Faith, Fundamental Doctrine of Belief, Tenet
इबादत= Prayers, Adoration
दाढ़ी= Beard
दहशतगर्दी= Terrorism,
इस्लाम= The religion of the Muslims
लतीफ़ा= Joke

बुधवार, 10 जनवरी 2018

तीर-ए-नज़र !!!

उसके तरकश में बाक़ी है कई ज़ुल्म-ओ-सितम,
फ़िलहाल तो ये वार तीर-ए-नज़र के देखिये !

जान भी मांगेगा एक दिन ये दिल लेने वाला,
सब्र कीजिये और फ़िर ईनआ' सब्र के देखिये !

चाँद भी रंजिशें रखता है जिसकी सबाहत से,
एक रात उसके शहर में भी ठहर के देखिये !

मैं हर सुबह क्यूँ मुस्कुराता हुआ जागता हूँ,
कभी ख़ुद को मेरे ख़्वाबों में आ कर के देखिये !

सुना है रात भर जागते हैं इश्क़ करने वाले,
नींद से रब्त न हो तो इश्क़ कर के देखिये !

सुना है की वो कुछ भी संभाल कर नहीं रखता,
ज़रा उनसे दिल तो अपना मांग कर के देखिये !

हाल-ए-दिल उनका भी पता चल ही जाएगा,
हाल-ए-दिल अपना ज़ाहिर तो करके देखिये !

इजाज़त हो तो 'फ़राज़' आपको ग़ज़ल कर दे
और फ़िर अश'आर अपने शायर के देखिये !

|||
फ़राज़ |||

तरकश= Quiver.
ज़ुल्म-ओ-सितम= Tyranny, Oppression.
फ़िलहाल= As of now, At present.
तीर-ए-नज़र= Arrow of glances.
सब्र= Patience, Endurance.
ईनआ'म= Prize, Reward
रंजिश= Ill-will, Hostility.
सबाहत= Beauty, Gracefulness, Comeliness.
रब्त= Intimacy, Bond, Connection.
हाल-ए-दिल= Condition of heart.
ज़ाहिर= Open, Reveal.
इजाज़त= Permission.
अश'आर= Couplets.

रविवार, 13 अगस्त 2017

वजह!!!

यूँ तो रोने को ग़म हज़ार हैं ज़माने में,
हंसने के लिए बस एक वजह बहुत है!

आ जाओ कि बसा लें हम एक दुनिया,
मेरे दिल में ख़ाली सी जगह बहुत है!

दिल है कि तेरी ही इबादत करता है,
यूँ तो इस ज़माने में ख़ुदा बहुत हैं!

लाख रंजिशें रख लें मुझसे दुनिया वाले,
दोस्त के दिल की एक दुआ बहुत है!

तुझसे जीत कर मैं कुछ न पाऊंगा,
तुझसे हार जाने में नफ़ा बहुत है!

जाने क्यूँ बस दिल को सज़ा मिलती है,
यूँ तो निगाहों के भी तो गुनाह बहुत है!

क़फ़स उन निगाहों की पुरमसर्रत हैं,
हसीन ये क़ैद की सज़ा बहुत है!

पलकें उठाने से वो घबराता है 'फ़राज़',
सुना है उसकी आँखों में हया बहुत है!

|||फ़राज़|||

क़फ़स= Prison, पुरमसर्रत= Full of happiness

शुक्रवार, 30 जून 2017

ख़ानाबदोशियां!!!

मुद्दतों तलक बेवजह दश्त-ओ-बियाबान भटके,
तेरे फ़ितूर से बचने को हम सारा जहान भटके !

यूँ तो हैं दिल को मेरे रंजिशें तुझसे हज़ार,
लेकिन पर्देदारियों की ख़ातिर बेज़ुबान भटके !

तेरे अक्स तलाशने चले थे तेरी मुंडेरों के साए में,
धूप छाँव के एक खेल में हम सुबह शाम भटके !

सोचा था मयक़शी से भर जायेंगे कुछ तो ज़ख्म,
लेकिन तेरी जलन में तिश्ना साक़ी-ओ-जाम भटके !

इतने भी नहीं तन्हा अभी ख़ानाबदोशियों से “फ़राज़”,
मेरी गर्दिशों में साथ मेरे भी कुछ महेरबान भटके !!!

|||फ़राज़|||

मुद्दत=for a long time
रंजिश=ill-will, hostility
तिश्ना=thirsty, insatiable, eagerly
साक़ी-ओ-जाम= bartender or cup-bearer and goblet.
दश्त-ओ-बियाबान= forest and deserts 
ख़ानाबदोशियाँ=nomadicity
गर्दिश= misfortune

शनिवार, 20 मई 2017

ऐ दिल !!!

फ़िर आज उसने दुआ की है शायद,
ज़िन्दगी फ़िर शादमां सी लगती है !

पलकें झपककर उसने हर बात कह दी,
रंजिशें आज सब बेवजह सी लगती हैं !

तुझसे ही मुक़म्मल है हर सफ़र मेरा,
तू है वाहिद, पर कारवां सी लगती है !

जब से गुज़रा है तू मेरी गलियों से,
मुझको ये ज़मीं कहकशां सी लगती है !

बड़े एहतराम से सोचा कर उसको ऐ दिल,
उसकी आँखें मुक़म्मल दुआ सी लगती हैं !

||| फ़राज़ |||
शादमां= Happy
रंजिशें= Hostility, Ill-Will
मुक़म्मल= Complete
वाहिद= Single, Lone, One
कहकशां= The Galaxy, The Milkyway
एहतराम= Respect, Honor.

गुरुवार, 23 मार्च 2017

तन्हा !!!

स्याह रात और हवाएं तन्हा,
स्याहियों से उलझी मेरी सदायें तन्हा !
कोई बादलों के पार नहीं रहता शायद,
लौट आती हैं मेरी ख़ामोश दुआएं तन्हा !

अक्सर मेरी ख़ामोशियों में शोर बनके,
चीख़ती रहती हैं मेरी आहें तन्हा !
तेरी राहों से मिले महज़ पांव के छाले,
लौटकर जब आयीं बेज़ार निगाहें तन्हा !

इस रु-ए-ज़मीं तक तुझको तलाश कर,
लौट आयीं मेरी नाकाम निगाहें तन्हा !
न तलब-ए-वफ़ा, न शिक़वा रंजिशों से,
बेकैफ़ सफ़र, बेकैफ़ सी राहें तन्हा !!!

||| फ़राज़ |||

रु-ए-ज़मीं= End of the world
बेकैफ़= = joyless, languid

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

उजाला

जाने क्या असर है उसकी बातों में,
फिर ज़ख्म कोई भरने लगा हो जैसे !

वो इख़्तियार से हो रहा है दाख़िल,
ये जहाँ फिर सँवरने लगा हो जैसे !

एक उजाला सा मेरे घर में फैला है,
चाँद आँगन में उतरने लगा हो जैसे !

रंजिशें सब आज झूठी लगती हैं,
वक़्त फ़िर साजिशें करने लगा हो जैसे !

कुछ तो असर है दुआओं में मेरी,
वो मेरे नाम पे ठहरने लगा हो जैसे !

हर ख़याल मेरा महकने लगा है, 
मेरी हर सांस में तू घुलने लगा हो जैसे ! 

रुख हवाओं ने बदला है फिर से,
मौसम आज निखरने लगा हो जैसे !