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शनिवार, 4 मार्च 2017

ख़यालों के धागे !!!

थाम कर मेरे ख़यालों की डोर
तू चला आता है
मेरे हर ख़याल में
और मेरे ही ख़यालों के धागों से
बुनता है तू ख़्वाब नए !

तुझको ही बोलती हैं
तुझको ही सुनती हैं
मेरी ख़ामोशियाँ !
करती हैं जिरह
मेरी ख़ामोशियों से
तेरी ख़ामोशियाँ !

साँसों से उलझी हैं
अब तलक
कुछ पहले सी साँसें
कुछ पहले सी ख़ुशबुएँ !

उस उम्र की रूह
क़ैद है अब तलक
मेरी रूह में
मेरे जिस्म में !

एक उम्र है गुज़री
दरमियाँ
तेरे आने से
तेरे जाने तक !

| फ़राज़ |

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

उजाला

जाने क्या असर है उसकी बातों में,
फिर ज़ख्म कोई भरने लगा हो जैसे !

वो इख़्तियार से हो रहा है दाख़िल,
ये जहाँ फिर सँवरने लगा हो जैसे !

एक उजाला सा मेरे घर में फैला है,
चाँद आँगन में उतरने लगा हो जैसे !

रंजिशें सब आज झूठी लगती हैं,
वक़्त फ़िर साजिशें करने लगा हो जैसे !

कुछ तो असर है दुआओं में मेरी,
वो मेरे नाम पे ठहरने लगा हो जैसे !

हर ख़याल मेरा महकने लगा है, 
मेरी हर सांस में तू घुलने लगा हो जैसे ! 

रुख हवाओं ने बदला है फिर से,
मौसम आज निखरने लगा हो जैसे !

गुरुवार, 17 नवंबर 2016

दहलीज़

एक सिहरन सी मेरी रगों में दौड़ती है,
सांस तेरी मुझे छू के गई हो जैसे !
बेसाख़्ता ही मुस्कुरा दिया एक ख़याल से मैं,
तेरी बातों में आज भी कोई गुदगुदी हो जैसे !

तेरी गर्दिश मेरे ज़हन में यूँ रहती है,
मेरी धड़कन से बाक़ी तेरी दोस्ती हो जैसे !
तेरे वजूद को ढूंढती हैं अक्सर बाहें,
मुझमें बाक़ी सी तेरी तिश्नगी हो जैसे !

हर अपने की अपनाईयत से वाकिफ़ हूँ,
धुंध आँखों से मेरी छंट गयी हो जैसे !
कल मैं गुज़रा था फ़िर तेरी गलियों से,
वो दीवार-ओ-दर अब अजनबी हों जैसे !

मेरे नाम से अब भी तू चौंक सा जाता है,
फांस कोई सीने में चुभी रह गयी हो जैसे !
तेरे अहसास ने फिर टटोला यूँ मेरे दिल को,
मेरी दहलीज़ पर आज भी तू खड़ी हो जैसे !

|||फ़राज़|||