थाम कर मेरे ख़यालों की डोर
तू चला आता है
मेरे हर ख़याल में
और मेरे ही ख़यालों के धागों
से
बुनता है तू ख़्वाब नए !
तुझको ही बोलती हैं
तुझको ही सुनती हैं
मेरी ख़ामोशियाँ !
करती हैं जिरह
मेरी ख़ामोशियों से
तेरी ख़ामोशियाँ !
साँसों से उलझी हैं
अब तलक
कुछ पहले सी साँसें
कुछ पहले सी ख़ुशबुएँ !
उस उम्र की रूह
क़ैद है अब तलक
मेरी रूह में
मेरे जिस्म में !
एक उम्र है गुज़री
दरमियाँ
तेरे आने से
तेरे जाने तक !
| फ़राज़ |