इस
तरह थे कभी फ़ासले ही नहीं,
यूँ मिले जैसे पहले मिले ही नहीं !
उनसे पहले कोई दर्द हमको न था,
उनसे पहले कोई ग़म मिले ही नहीं !
आ भी जाओ तो वो बात होगी नहीं,
तुममें हममें वो अब सिलसिले ही नहीं !
सारे इल्ज़ाम तस्लीम हमने किये,
दरमियाँ अब कोई मसअले ही नहीं !
आख़िरी बार हमसे वो ऐसे मिले,
जैसे पहले कभी भी मिले ही नहीं !
उनको ख़ुश देख कर हम ज़रा जल गए,
हमको लगता था हम दिल-जले ही नहीं !
उम्र भर की कचहरी का चक्कर है इश्क़,
रोज़ तारीख़ है, फ़ैसले ही नहीं !
उनसे ‘अल्फ़ाज़’ जब इश्क़ ही न रहा,
उनसे शिकवे नहीं, और गिले ही नहीं !
||| अल्फ़ाज़ |||
फ़ासले = Distance, दूरी
इल्ज़ाम = Allegation,
Blame, आरोप
तस्लीम = Accept,
Acknowledge, स्वीकार
दरमियाँ = Middle,
In Between, मध्य
मसअले = Problem
, Matter,
दिल-जले = Bereaved,
Frustrated
कचहरी = Court, न्यायालय
तारीख़ = Date,
फ़ैसले = Decision,
Judgment, निर्णय
शिकवे = Complaint,
Reproach
गिले = Complaint,
Lamentation