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शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019

मोहब्बत

ये जो उनसे ज़रा सी शिकायत हुई,
देखिये तो सही क्या मोहब्बत हुई !

चोट प्यारी सी है, दर्द मीठा सा है,
दिल को भी एक अजब सी अज़ीयत हुई ! 

एक तेरे सिवा सूझता कुछ नहीं,
अब ज़हन की भी दिल जैसी हालत हुई !

आज मेरे लिए मुस्कुरा वो दिए,
ज़िन्दगी ख़ुशनुमा, पुर-मसर्रत हुई !

दिल में महफ़िल है, त्यौहार और जश्न है,
इश्क़ इतवार की जैसे फ़ुर्सत हुई !

हर तसव्वुर तेरा है अदब से किया,
इस तरह आशिक़ी भी इबादत हुई !

उनके आने से 'अल्फ़ाज़' की ज़िन्दगी,
मेहरबान और ख़ूबसूरत हुई !

||| अल्फ़ाज़ |||

शिकायत = Complaint
अजब = Strange, Wonderful, 
अज़ीयत = Trouble, Suffering, 
ज़हन = Mind, Brain, 
ख़ुशनुमा = Pleasant, Beautiful, 
पुरमसर्रत = Joyous, Full Of Happiness
महफ़िल = Party, The Congregation
त्यौहार = Festival
जश्न = A Feast, A Jubilee, Celebration
फ़ुर्सत = Leisure, Freedom, Rest
तसव्वुर = Imagination, Contemplation,
अदब = Respect, Courtesy
आशिक़ी = Love, State Of Being In Love Courtship
तसव्वुर = Imagination, Contemplation,
अदब = Respect, Courtesy
आशिक़ी = Love, State Of Being In Love Courtship
इबादत = Prayer, Worship
मेहरबान = Benign, Kind,

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

तक़ाज़ा

पूछिए मत कि क्या-क्या तक़ाज़ा किया,
बे-वफ़ा ने वफ़ा का तक़ाज़ा किया !

हम थे अह्ल-ए-नज़रदेख न हम सके,
पत्थरों से ख़ुदा का तक़ाज़ा किया !

सब ख़ताएँ हमारी ही साबित हुईं,
जब भी उनकी ख़ता का तक़ाज़ा किया !

उनकी ग़लती है क्याइश्क़ हमने किया,
हमने ख़ुद की सज़ा का तक़ाज़ा किया !

मय-कशी के सिवा कोई चारा न था,
जब ज़हर ने दवा का तक़ाज़ा किया !

जलती लौ को हवाओं से डर था मगर,
बुझ गई तो हवा का तक़ाज़ा किया !

हमने बस अपनी माँ का तसव्वुर किया,
जब नज़र ने ख़ुदा का तक़ाज़ा किया !

सादगी भी तो 'अल्फ़ाज़की देखिये,
दुश्मनों से दुआ का तक़ाज़ा किया !

||| अल्फ़ाज़ |||

तक़ाज़ा = Demand, Urge, माँग
बे-वफ़ा = Faithless, Treacherous
वफ़ा = Fulfillment, Fidelity, Faithful
अह्ल-ए-नज़र = People Of Vision आँख-वाले
ख़ताएँ = Mistakes, Errors त्रुटियाँ, दोष
साबित = Confirm, Prove, Fixed, सिद्ध
मय-कशी =  Boozing, To Drink मदिरापान
चारा = Remedy, Option, Way, युक्ति,
लौ = Candle Flame
तसव्वुर = Imagination, Contemplation, कल्पना
सादगी = Simplicity सरलता, निष्कपटता

शनिवार, 3 नवंबर 2018

मंज़र

एक सवाल में उलझा हूँ उम्र भर से मैं,
कि मंज़र गुज़र जाता है या मंज़र से मैं !

यहाँ अभी न हिंदू
, न मुसलमान हूँ मैं,
शहर मुझसे अजनबी है और शहर से मैं !

इंसान से तो सीखा है ख़ुदगर्ज़ होना,
सख़ावत तो सीखा हूँ शजर से मैं !

मैं कहीं रहूँदिल तो घर पे रहता है,
न घर मुझसे दूर है, न घर से मैं !

कोई माटी का तो कोई बुत तसव्वुर का,
डरता हूँ अपने ही बनाये डर से मैं !

वो आ के थम जाएगी मेरे साहिल पर,
उम्मीद लगाये बैठा था एक लहर से मैं !

हर मील का पत्थर ये गवाही देगा,
कि सफ़र मुझसे था या सफ़र से मैं !

मर्तबे बिकते नहीं हैं  बाज़ारों में,
'अल्फ़ाज़बना हूँ अपने हुनर से मैं !

||| अल्फ़ाज़ |||

मंज़र= Scene, View
ख़ुदगर्ज़= Selfish
सख़ावत= Generosity
शजर= Tree
माटी= Mud, Clay, Silt
बुत= Idol
तसव्वुर= Imagination
मर्तबा= Account, Class, Degree, Office
हुनर= Art, Skill, Talent

शुक्रवार, 22 जून 2018

दिल की ज़बानी !!!

सीने से लगा के आपको धड़कन सुनानी है,
दिल ही समझ पाएगा जो दिल की ज़बानी है !

मेरी सुनता है कहाँ दिल जो तेरी सुने,
दिल-ए-नादाँ ने भला कब किसी की मानी है !

मेरी नज़रों से आप कभी ख़ुद को देखिये,
किस क़दर मेरी नज़र आपकी दीवानी है !

तू सैलाब सा बहता है मेरी रग-रग में,
मैं ठहरा समंदर सातू मौज की रवानी है !

तपते सहरा में तेरा साथ है बाईस-ए-सुकूँ,
तू साथ है तो अमावास रात भी नूरानी है !

अब्र के साए सा साथ-साथ चलता है,
तू साथ है तो ख़िज़ाँ भी शादमानी है !

मुझपे बरस जाओ घिर के कभी सावन की तरह,
मैं तपता हुआ सहरातू बारिश का पानी है !

मुझसे हर मोड़ पर तू मिल ही जाता है,
कुछ तो ज़रूर तेरी मेरी कहानी है !

तेरा तसव्वुर भी पाकीज़गी से करता हूँ मैं,
दरमियाँ कुछ तो है ‘फ़राज़’ जो रूहानी है ! 

||| फ़राज़ |||


ज़बानी= By Word Of Mouth, Orally, Verbal, Verbally
दिल-ए-नादाँ= Innocent Heart
ख़ुद= Self
क़दर= Amount
नज़र= Eye, Vision
सैलाब= A Flood, Deluge, Inundation, Torrent
रग= Vein, Artery, Fiber, Nerve
मौज= Wave
रवानी= Fluency, Sharpness, Speed, Flow
सहरा= Desert, Wilderness
बाईस-ए-सुकूँ= Reason For Peace And Tranquility
नूरानी= Luminous, Resplendent
अब्र= Cloud
ख़िज़ाँ= Autumn
शादमानी= Happiness
तसव्वुर= Imagination, Thought
पाकीज़गी= Purity
दरमियाँ= Between
रूहानी= Spiritual

गुरुवार, 7 जून 2018

उम्र-ए-दराज़ !!!

जिस्मों की तो आदत है, मिल करके बिछड़ जाना,
तुम मिलना तो ऐसे मिलना कि रूह में उतर जाना !

मुड़कर के हमने देखा, जब अपनी ज़िन्दगी को,
उम्र--दराज़ बस एक लम्हे का गुज़र जाना !

बेफ़िक्र किस क़दर था वो इश्क़ का ज़माना,
कर के तेरा तसव्वुर आठों पहर जाना !

मुझसे तेरी नज़र का पहले-पहल वो मिलना,
सदियों की गर्दिशों का लम्हें में ठहर जाना !

वो जाते-जाते तेरा मुड़कर के मुस्कुराना,
एक रूठती सी किस्मत का फ़िर से संवर जाना !

सब झूठ तो नहीं है, एक बात वो भी सच थी,
ज़िक्र--फ़िराक़ से तेरी आँखों का वो भर जाना !

देखा जो परिंदों को, तो याद आया हमको,
वो शामों का ढलना, वो लौट के घर जाना !

इस बार तो इतना भी तक़दीर में नहीं है,
हो ईद का बहाना और अपने शहर जाना !

||| फ़राज़ |||

जिस्म= Body, Material, Substance
रूह= Soul, Spirit, The Vital Principle
उम्र--दराज़= Long Life
लम्हा= Moment
बेफ़िक्र= Carefree
क़दर= Amount, Appreciation, 
ज़माना= Era
तसव्वुर= Imagination, Thought
पहर= Period Of Time, An 8th Hour Of A Day.
पहले-पहल= Initially, The First Time.
सदियों= Centuries, Centenaries
गर्दिशों= Revolution, Circulation, Misfortune
ज़िक्र--फ़िराक़= Mention/Talk of parting
परिंदों= Birds
तक़दीर= Fate, Destiny.