एक
सवाल में उलझा हूँ उम्र भर से मैं,
कि मंज़र गुज़र जाता है या मंज़र से मैं !
यहाँ अभी न हिंदू, न मुसलमान हूँ मैं,
शहर
मुझसे अजनबी है और शहर से मैं !
इंसान से तो सीखा है ख़ुदगर्ज़ होना,
सख़ावत तो सीखा हूँ शजर से मैं !
मैं
कहीं रहूँ, दिल तो घर पे रहता है,
न
घर मुझसे दूर है, न घर से मैं !
कोई माटी का तो कोई बुत तसव्वुर का,
डरता
हूँ अपने ही बनाये डर से मैं !
वो आ के थम जाएगी मेरे साहिल पर,
उम्मीद
लगाये बैठा था एक लहर से मैं !
हर मील का पत्थर ये गवाही देगा,
कि
सफ़र मुझसे था या सफ़र से मैं !
मर्तबे बिकते नहीं हैं बाज़ारों में,
'अल्फ़ाज़' बना हूँ अपने हुनर से मैं !
||| अल्फ़ाज़ |||
मंज़र= Scene, View
ख़ुदगर्ज़=
Selfish
सख़ावत= Generosity
शजर=
Tree
माटी= Mud, Clay, Silt
बुत= Idol
तसव्वुर=
Imagination
मर्तबा= Account, Class, Degree, Office
हुनर= Art, Skill, Talent