namaz लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
namaz लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

मनमर्ज़ियाँ !!!

ज़िन्दगी को ज़िन्दगी की वजह चाहिए,
जैसे अधूरी ग़ज़ल को क़ाफ़िया चाहिए !

मनमर्ज़ियों को चाहिए आज़ादियाँ सारी,
अब फ़राज़ को फ़राज़ का मर्तबा चाहिए !

इबादत में चाहिए इतनी शिद्दत,
कि रु-ब-रु नमाज़ में ख़ुदा चाहिए !

मन को सुकून चाहिए मस्जिद जैसा,
हक़ीक़त में किताबों सा ख़ुदा चाहिए !

बे-ख़्वाब हो चली हैं आँखें मेरी,
अब तो इस रात की सुबह चाहिए !

बिन बोले जिसे सब समझ जाते थे,
बे-लफ्ज़ वही बचपन की ज़बाँ चाहिए !

झूठी हंसी का बोझ अब उठता नहीं मुझसे,
ज़िन्दगी को फिर कोई कहकहा चाहिए !

कैसे करूँ यक़ीन कि वो बेवफ़ा है फ़राज़’,
जुदाई की कोई झूठी वजह चाहिए !

||| फ़राज़ |||

वजह (Wajah) = Cause, Reason
क़ाफ़िया (Qaafiya) = Rhyme, The Last Or Second Last Words Of Each Verse Is Called Qaafiyaa
मनमर्ज़ियां (Manmarziyan) = Heart’s Desires
आज़ादियाँ (Aazadiyan) = Independencies, Freedom
फ़राज़ (Faraaz) = Height, Elevation, 
फ़राज़ (Faraaz) = Pen Name, 
मर्तबा (Martaba) = Class, Degree, Position
इबादत (Ibadat) = Prayer, Adoration
शिद्दत (Shiddat) = Intensity, Passion, Force
रु-ब-रु (R-Ba-Ru) = Face To Face, In Person, In Front Of.
सुकून (Sukoon) = Peace, Tranquility
हक़ीक़त (Haqiqat) = Reality, 
बे-ख़्वाब (Be-Khwab) = Without A Dream, Dreamless, Sleepless.
बे-लफ्ज़ (Be-Lafz) = Without A Word, Wordless.
ज़बाँ (Zabaan) = Tongue, Speech
कहकहा (Kahkaha) = Loud And Hearty Laugh
यक़ीन (Yaqeen) = Believe, Trust
बेवफ़ा (Bewafa) = Faithless, Treacherous.
जुदाई (Judaai) = Separation

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

!!! नाम-ए-फ़राज़ !!!

कोई न जोड़ पाया है कभी टूटे हुए दिल को,
तेरी शीशागरी पे तुझको इतना नाज़ बेजा है !

कि उसके नाज़ नख़रों के सवाली और भी होंगे,
मनाने वो न आयेगा, कि तू नाराज़ बेजा है !

तुझे तो जीतना है आसमान की हर बुलंदी को,
अगर मंज़िल ज़मीं है तो तेरी परवाज़ बेजा है !

नहीं थमते तेरे मन के ये कारोबार दुनिया के,
महज़ कसरत ज़बानी हो तो वो नमाज़ बेजा है !

तजरबे हैं बुरे लेकिन सबक़ अच्छा मैं देता हूँ,
तेरी इस्लाह न कर पायें तो मेरे अल्फ़ाज़ बेजा हैं !

तेरे मेरे कलम में तो स्याही एक जैसी है,
अगर बेहतर न मैं लिखूं तो नाम-ए-फ़राज़ बेजा है !

||| फ़राज़ |||


शीशागरी= Art of glass-making.
नाज़= Pride, Proud.
बेजा= Fruitless, Unbecoming, Unfair, Unbefitting.
नख़रा= Coquetry
सवाली= A beggar, A petitioner
नाराज़= Displeased, Offended.
बुलंदी= High place, Height, Loftiness
मंज़िल= Destination
परवाज़= Flight
कारोबार= Business, Trade, affair
महज़= Merely, Only
कसरत= Exercise
ज़बानी= Oral, Verbal
तजरबे= Experiences,
सबक़= Lesson
इस्लाह= Correction, Reform
अल्फ़ाज़= Words
स्याही= Ink
बेहतर= Better

नाम-ए-फ़राज़= Name of Faraaz (In respect of the great Urdu poet Ahmed Faraz Sir)

शनिवार, 3 मार्च 2018

!!! ज़िन्दगी !!!

ज़िन्दगी, तू इतनी क्यूँ ख़फ़ा हो गई,
कि दर्द ही दर्द की दवा हो गई !

चल अब मौत से इश्क़ करके देखें,
ज़िन्दगी तो आदतन बेवफ़ा हो गई !

तेरे मुख़्तसर से ख़याल में डूबे हुए,
आज फ़िर रात से सुबह हो गई !

जलने की ज़िद तो पतंगे ने की थी,
बदनाम तो बेवजह ही शमा हो गई !

ख़ुदारा तूने इतनी अक़्ल क्यूँ दे दी,
देख तेरी ये मख़्लूक़ आप ख़ुदा हो गई !

आज माँ के चेहरे पर एक सुकून देखा,
अदा नमाज़ और क़ुबूल दुआ हो गई !

जब मेरे यार ने मुझे गले लगाया,
कि मेरे हर मर्ज़ की शिफ़ा हो गई !

मेरी बेगुनाही की दलील सिर्फ़ इतनी है,
मैं भी इन्सान हूँ, मुझसे भी ख़ता हो गई !

ख़ुद पे यक़ीन रखके मैं आगे बढ़ता रहा,
'फ़राज़मुकम्मल हर एक दुआ हो गई !

||| फ़राज़ |||

ख़फ़ा= Displeased, Angry
आदतन= Habitually
बेवफ़ा= Faithless, Treacherous
मुख़्तसर= Concise, Short, Brief
ख़याल= Thought
ज़िद= Insistence
पतंगा= Moth
बदनाम= Defame, Malign
बेवजह= Without reason
शमा= Candle
ख़ुदारा= God
अक़्ल= Wisdom, Brain, Knowledge
मख़्लूक़= Creation
आप= Self
सुकून= Peace
नमाज़= prayer (especially as prescribed by the Muslim law)
क़ुबूल= Accept
दुआ= benediction
मर्ज़= Sickness, Illness
शिफ़ा= Cure, Healing
बेगुनाही= Innocence
दलील= Argument
ख़ता= Mistake, Fault
ख़ुद= Self, Oneself
यक़ीन= Trust, Confidence
मुकम्मल= Complete



रविवार, 3 दिसंबर 2017

फ़ासले !!!

जान का क्या ग़म, एक ही बार तो जानी है,
ये सोच के ज़िन्दगी को रोज़ आज़माया हमने !

दिल ही आशना था तूफ़ान की मौजों से,
घर इसलिए ही साहिल पर था बनाया हमने !

आज फ़िर नमाज़ में तेरा ख़याल आया है,
आज फ़िर गुनाह-ए-शरियत दोहराया हमने !

क्या ख़बर थी की वो ख़ुदा पत्थर का है,
अपना मज़हब था जिसको बनाया हमने !

रिश्तों को निभाने की आदतें थी हमें,
कुछ ग़लतियों को भी आदतन निभाया हमने !

कौन होता है हमसफ़र गर्दिश के सितारे का,
परख कर देख लिया हर अपना पराया मैंने !

देख आज वो फ़िर आसरा मांगने आया है,
दिल की मिट्टी से घर जिसका बनाया हमने !

ये क्या लिख दिया फ़राज़ की बेवफ़ा है वो,
ये राज़ अब तलक सबसे था छुपाया हमने !

बताना था ज़माने को रुख़ हवाओं का,
ख़त के पुर्ज़ों को फ़ज़ा में उड़ाया हमने !

फ़ासले फ़िर वो नए देकर चला गया,
दूरियां मिटाने था जिसको बुलाया हमने !

|||फ़राज़|||

ग़म= Sorrow, Grief.
आशना= Intimate, Acquaintance.
मौज= Wave
साहिल= Beach, Coast.
गुनाह-ए-शरियत= A sin or crime according to Islamic law.
मज़हब= Religion
आदतन= Habitually
गर्दिश= Misfortune, Rotation, Circulation
आसरा= Shelter.
बेवफ़ा= Infidel.
ज़माना= The world, The era.
रुख़= Direction.
पुर्ज़े= Shreds, Pieces.
फ़ज़ा= Ambience.
फ़ासले= Distances, Spaces