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बुधवार, 24 जुलाई 2019

किसको है !

अब हिज्र की हैबत किसको है,
अब उनसे मोहब्बत किसको है !

अब लोग ज़रा जल्दी में है,
जीने की फ़ुर्सत किसको है !

आमाल ज़रा सबके देखो,
दोज़ख़ से दहशत किसको है !

गर मिले हमें तो जाएज़ है,
रिश्वत से अज़ीयत किसको है !

गर फिसले ज़बाँतो बात अलग,
सच कहने की आदत किसको है !

दुनिया के
 मसाइल क्या कम हैं,
मज़हब की ज़रुरत किसको है  !

'अल्फ़ाज़जो न हो मौत का डर,
तो रब की ज़रुरत किसको है !

||| अल्फ़ाज़ |||

हिज्र = Separation From Beloved, जुदाईविरह
हैबत = Fright, Panic, भयडर,
फ़ुर्सत = Leisure, Rest, आराम 
आमाल = Deeds, Conducts, कर्मव्यवहार
दोज़ख़ = Hell, नर्क
दहशत = Terror, Fear,आतंक 
गर = If, यदि
जाएज़ = Legal, Right, उचितवैध
रिश्वत = Bribe, घूस
अज़ीयत = Trouble, Suffering, कष्ट
ज़बाँ = Tongue, जिह्वाजीभ
मसाइल = Problems, Issues, समस्याएँमुद्दे
मज़हब = Religion, धर्म
रब = God, अल्लाह, ईश्वर

मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

कशमकश

इतना जल्दी न दिल में बसा लीजिये,
थोड़ा उनका भी तो इम्तिहाँ लीजिये !

देखिये वो निगाहों का ठग तो नहीं,
यूँही ख़तरा न दिल का उठा लीजिये !

बात करता है तो बात कर लीजिये,
अपनी आदत न उसको बना लीजिये !

जीत लेने में उनको मज़ा है मगर,
कश्मकश का भी तो कुछ मज़ा लीजिये !

ज़ुल्फ़ को अपने रुख़ से हटा लीजिये !
तमन्नाई के दिल की दुआ लीजिये,

कौन कहता है दिल को लगा लीजिये,
दिल्लगी का भी तो कुछ मज़ा लीजिये !

गर्मियाँ उनके एहसास में ख़ूब हैं,
आप इन सर्दियों का मज़ा लीजिये !

जनवरी की तरह वो ज़रा दूर है,
बस दिसंबर सब्र से बिता लीजिये

सिर्फ़ दिल के कहे पे न ‘अल्फ़ाज़’ चल,
कुछ ज़हन का भी तो मशवरा लीजिये !

||| अल्फ़ाज़ |||

इम्तिहाँ = Test, Exam
ठग  = Cheat, Fraud
ख़तरा = Risk, Danger,
कश्मकश = Struggle, Wrangle, Tussle
ज़ुल्फ़ = A Curling Lock (Of Hair)Hanging Over The Temple Or Ear, Tresses
रुख़ = Face, Appearance, Direction, Features
तमन्नाई =  Desirer, Requestor 
दिल्लगी = Amusement, Merriment
एहसास = Feeling, Perception
ख़ूब = Good, Well, Beautiful, Pleasant
सब्र = Patience, Endurance
ज़हन = Mind, Knowledge
मशवरा = Counsel, Consultation

रविवार, 28 अक्टूबर 2018

हसरत

पाँवों को फैलाने की फ़ितरत का क्या करूँ,
चादर का नहीं दोषमैं हसरत का क्या करूँ !

ऐ काश भुला पाता तुम्हे मैं भी मुकम्मल,
शिकवे तो भूल जाऊँमोहब्बत का क्या करूँ !

तुमको है यही ज़िद कि भुला दूँ तुम्हें मैं भी,
ख़्वाहिश तो छोड़ दूँ मैं आदत का क्या करूँ !

ज़िद छोड़ दूँ तेरी मगर मसअला है कुछ अलग,
हसरत तो दबा लूँमैं ज़रुरत का क्या करूँ !

अच्छी तरह पहचानता हूँ मैं तेरे मुखौटे,
सीरत तेरी बुरी है तो सूरत का क्या करूँ !

हर इल्ज़ाम गवारा था तेरे इश्क़ में हमको,
तू ही नहीं तो मैं तेरी तोहमत का क्या करूँ !

रुक जायेगा तूने अगर सोचा कभी ऐसा,
मेहनत में न कमी थी मैं क़िस्मत का क्या करूँ !

'अल्फ़ाज़मैं क्या पाउँगा हो कर के जन्नती,
जब यार हों  दोज़ख़ में तो जन्नत का क्या करूँ !

||| अल्फ़ाज़ |||

फ़ितरत= Nature
दोष= Fault, Sin
हसरत= Unfulfilled Desire
मुकम्मल= Complete
शिक़वा= Complaint, Reproach
ख़्वाहिश= Wish, Inclination
मसअला= Problem, Matter,
मुखौटे= Mask
सीरत= Quality, Disposition, Character
इल्ज़ाम= Accusation, Charge, Blame
गवारा= Bearable, Tolerable
तोहमत= Allegation, Accuse
जन्नतीDweller In Paradise
दोज़ख़= Hell

गुरुवार, 7 जून 2018

उम्र-ए-दराज़ !!!

जिस्मों की तो आदत है, मिल करके बिछड़ जाना,
तुम मिलना तो ऐसे मिलना कि रूह में उतर जाना !

मुड़कर के हमने देखा, जब अपनी ज़िन्दगी को,
उम्र--दराज़ बस एक लम्हे का गुज़र जाना !

बेफ़िक्र किस क़दर था वो इश्क़ का ज़माना,
कर के तेरा तसव्वुर आठों पहर जाना !

मुझसे तेरी नज़र का पहले-पहल वो मिलना,
सदियों की गर्दिशों का लम्हें में ठहर जाना !

वो जाते-जाते तेरा मुड़कर के मुस्कुराना,
एक रूठती सी किस्मत का फ़िर से संवर जाना !

सब झूठ तो नहीं है, एक बात वो भी सच थी,
ज़िक्र--फ़िराक़ से तेरी आँखों का वो भर जाना !

देखा जो परिंदों को, तो याद आया हमको,
वो शामों का ढलना, वो लौट के घर जाना !

इस बार तो इतना भी तक़दीर में नहीं है,
हो ईद का बहाना और अपने शहर जाना !

||| फ़राज़ |||

जिस्म= Body, Material, Substance
रूह= Soul, Spirit, The Vital Principle
उम्र--दराज़= Long Life
लम्हा= Moment
बेफ़िक्र= Carefree
क़दर= Amount, Appreciation, 
ज़माना= Era
तसव्वुर= Imagination, Thought
पहर= Period Of Time, An 8th Hour Of A Day.
पहले-पहल= Initially, The First Time.
सदियों= Centuries, Centenaries
गर्दिशों= Revolution, Circulation, Misfortune
ज़िक्र--फ़िराक़= Mention/Talk of parting
परिंदों= Birds
तक़दीर= Fate, Destiny.






रविवार, 3 दिसंबर 2017

फ़ासले !!!

जान का क्या ग़म, एक ही बार तो जानी है,
ये सोच के ज़िन्दगी को रोज़ आज़माया हमने !

दिल ही आशना था तूफ़ान की मौजों से,
घर इसलिए ही साहिल पर था बनाया हमने !

आज फ़िर नमाज़ में तेरा ख़याल आया है,
आज फ़िर गुनाह-ए-शरियत दोहराया हमने !

क्या ख़बर थी की वो ख़ुदा पत्थर का है,
अपना मज़हब था जिसको बनाया हमने !

रिश्तों को निभाने की आदतें थी हमें,
कुछ ग़लतियों को भी आदतन निभाया हमने !

कौन होता है हमसफ़र गर्दिश के सितारे का,
परख कर देख लिया हर अपना पराया मैंने !

देख आज वो फ़िर आसरा मांगने आया है,
दिल की मिट्टी से घर जिसका बनाया हमने !

ये क्या लिख दिया फ़राज़ की बेवफ़ा है वो,
ये राज़ अब तलक सबसे था छुपाया हमने !

बताना था ज़माने को रुख़ हवाओं का,
ख़त के पुर्ज़ों को फ़ज़ा में उड़ाया हमने !

फ़ासले फ़िर वो नए देकर चला गया,
दूरियां मिटाने था जिसको बुलाया हमने !

|||फ़राज़|||

ग़म= Sorrow, Grief.
आशना= Intimate, Acquaintance.
मौज= Wave
साहिल= Beach, Coast.
गुनाह-ए-शरियत= A sin or crime according to Islamic law.
मज़हब= Religion
आदतन= Habitually
गर्दिश= Misfortune, Rotation, Circulation
आसरा= Shelter.
बेवफ़ा= Infidel.
ज़माना= The world, The era.
रुख़= Direction.
पुर्ज़े= Shreds, Pieces.
फ़ज़ा= Ambience.
फ़ासले= Distances, Spaces