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मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

कशमकश

इतना जल्दी न दिल में बसा लीजिये,
थोड़ा उनका भी तो इम्तिहाँ लीजिये !

देखिये वो निगाहों का ठग तो नहीं,
यूँही ख़तरा न दिल का उठा लीजिये !

बात करता है तो बात कर लीजिये,
अपनी आदत न उसको बना लीजिये !

जीत लेने में उनको मज़ा है मगर,
कश्मकश का भी तो कुछ मज़ा लीजिये !

ज़ुल्फ़ को अपने रुख़ से हटा लीजिये !
तमन्नाई के दिल की दुआ लीजिये,

कौन कहता है दिल को लगा लीजिये,
दिल्लगी का भी तो कुछ मज़ा लीजिये !

गर्मियाँ उनके एहसास में ख़ूब हैं,
आप इन सर्दियों का मज़ा लीजिये !

जनवरी की तरह वो ज़रा दूर है,
बस दिसंबर सब्र से बिता लीजिये

सिर्फ़ दिल के कहे पे न ‘अल्फ़ाज़’ चल,
कुछ ज़हन का भी तो मशवरा लीजिये !

||| अल्फ़ाज़ |||

इम्तिहाँ = Test, Exam
ठग  = Cheat, Fraud
ख़तरा = Risk, Danger,
कश्मकश = Struggle, Wrangle, Tussle
ज़ुल्फ़ = A Curling Lock (Of Hair)Hanging Over The Temple Or Ear, Tresses
रुख़ = Face, Appearance, Direction, Features
तमन्नाई =  Desirer, Requestor 
दिल्लगी = Amusement, Merriment
एहसास = Feeling, Perception
ख़ूब = Good, Well, Beautiful, Pleasant
सब्र = Patience, Endurance
ज़हन = Mind, Knowledge
मशवरा = Counsel, Consultation

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

तमन्नाई !!!

तमन्नाई हम उस नज़र के हैं,
जिसपे परदे जहान भर के हैं !

काश कट जाये मेरा सर वतन के लिए,
कुछ अरमान तो मेरे भी सर के हैं !

अच्छाई की शोहरत में उम्र लगती है,
मगर पंख लगते बुरी ख़बर के हैं !

क्या मेरे गाँव सा सुकून वहां मिलता है?
आप ही बताइए, आप तो शहर के हैं !

अल्लाह नहीं रहता सिर्फ़ मस्जिद में,
न ही भगवान सिर्फ़ मंदिर के हैं !

जिनकी हिफ़ाज़त में इंसान लगे रहते हैं,
बेशक वो ख़ुदा महज़ पत्थर के हैं !

शायद कोई अपना ही तेरा क़ातिल होगा,
तेरी पीठ पर निशान ख़ंजर के हैं !

मत पूछिये कि मेरे ग़म का सबब क्या है,
फ़राज़ये रंज तो अब उम्र भर के हैं !

||| फ़राज़ ||| 

तमन्नाई= Requester
वतन= Abode, Native Country
अरमान= Wish, Desire
शोहरत= Renown, Fame
सुकून= Peace 
हिफ़ाज़त= Protection
बेशक= Doubtless
महज़= Only, Merely
क़ातिल= Murderer
निशान= Mark, Impression, A Clue
ख़ंजर= Knife, Dagger
ग़म= Sorrow, Grief
सबब= Cause, Reason

रंज= Sorrow

बुधवार, 25 अप्रैल 2018

ग़ज़ल-ए-फ़राज़ !!!

फ़र्क़ पड़ता है क्या कि सज़ा क्या है,
इश्क़ बदनाम न हो तो मज़ा क्या है !

रतजगे, तन्हाई, मलाल और तड़प,
हमको मालूम है कि वफ़ा क्या है !

अरमान दिल में तो कई बाक़ी हैं,
 ज़हन, तेरा मशवरा क्या है !

इश्क़ करना है तो फ़िर ये न सोचिये,
कि नुक़सान क्या, और नफ़ा क्या है !

इश्क़ गुनाह है तो हम मुजरिम बेहतर,
इश्क़ मर्ज़ है तो फिर शिफ़ा क्या है !

आज फ़िर हूँ मैं तेरा तमन्नाई हूँ,
इस दफ़ा मेरा इम्तिहाँ क्या है !

जब दिल टूटेगा तो ख़ुद समझ जाओगे,
इश्क़ मिसरा है तो क़ाफ़िया क्या है !

ये ग़ज़ल-ए-फ़राज़ नज़ीर इस बात की है,
कि हादिसा मेरे दिल पे गुज़रा क्या है !

||| फ़राज़ |||

फ़र्क़= Difference.
रतजगा= Vigil,  Keeping Awake All Night
तन्हाई= Loneliness
मलाल= Regret
तड़प= Agitation Of Mind And Body
मालूम= Known
वफ़ा= Faithfulness, Loyalty
अरमान= Desire, Longing
बाक़ी= Remaining, Perpetual
ज़हन= Mind
मशवरा= Advice, Counsel
नुक़सान= Loss, Damage
नफ़ा= Profit
गुनाह= Sin, Crime
मुजरिम = Sinner, Culprit.
बेहतर= Better
मर्ज़= Illness, Sickness
शिफ़ा= Heal, Cure
तमन्नाई= Wisher, Desirous, 
दफ़ा= Time
इम्तिहाँ= Exam, Trail, Test
मिसरा= One Line Of A Couplet Or Verse.
क़ाफ़िया= Rhyme, The Last Or Second Last Words Of Each Verse Is Called Qafiya
ग़ज़ल-ए-फ़राज़= Gazal Of Faraz
नज़ीर= Precedent, Example.
हादिसा= Accident, Calamity, Misfortune
गुज़रा= Passed, Gone