फ़र्क़ पड़ता है क्या कि सज़ा क्या है,
इश्क़ बदनाम न
हो तो मज़ा क्या है !
रतजगे, तन्हाई, मलाल और तड़प,
हमको मालूम है कि वफ़ा क्या है !
अरमान दिल में तो कई बाक़ी हैं,
ऐ ज़हन,
तेरा मशवरा क्या है !
इश्क़ करना है
तो फ़िर ये न सोचिये,
कि नुक़सान क्या, और नफ़ा क्या
है !
इश्क़ गुनाह
है तो हम मुजरिम बेहतर,
इश्क़ मर्ज़ है तो फिर शिफ़ा क्या है !
आज फ़िर हूँ
मैं तेरा तमन्नाई हूँ,
इस दफ़ा मेरा इम्तिहाँ क्या है !
जब दिल
टूटेगा तो ख़ुद समझ जाओगे,
इश्क़ मिसरा है तो क़ाफ़िया क्या है !
ये ग़ज़ल-ए-फ़राज़ नज़ीर इस
बात की है,
कि हादिसा मेरे दिल पे गुज़रा क्या है !
||| फ़राज़ |||
फ़र्क़= Difference.
रतजगा= Vigil, Keeping Awake All Night
तन्हाई= Loneliness
मलाल= Regret
तड़प= Agitation Of Mind And Body
मालूम= Known
वफ़ा= Faithfulness, Loyalty
अरमान= Desire, Longing
बाक़ी= Remaining, Perpetual
ज़हन= Mind
मशवरा= Advice, Counsel
नुक़सान= Loss, Damage
नफ़ा= Profit
गुनाह= Sin, Crime
मुजरिम = Sinner, Culprit.
बेहतर= Better
मर्ज़= Illness, Sickness
शिफ़ा= Heal, Cure
तमन्नाई= Wisher, Desirous,
दफ़ा= Time
इम्तिहाँ= Exam, Trail, Test
मिसरा= One Line Of A Couplet Or Verse.
क़ाफ़िया= Rhyme,
The Last Or Second Last Words Of Each Verse Is Called Qafiya
ग़ज़ल-ए-फ़राज़= Gazal Of Faraz
नज़ीर= Precedent, Example.
हादिसा= Accident,
Calamity, Misfortune
गुज़रा= Passed, Gone