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मंगलवार, 6 अगस्त 2019

मेरी ग़ज़ल

जब तेरे ख़यालात पे मचली मेरी ग़ज़ल,
तब दश्त-ओ-बयाबान में भटकी मेरी ग़ज़ल !

सीने में फिर से कोई अरमान जला है,
काग़ज़ पे आतिशाना सुलगी मेरी ग़ज़ल !

दिल ने तेरी उम्मीद की शम्मा जलाई है,
जल कर के मोम जैसी पिघली मेरी ग़ज़ल !

जैसे कि चाँद पर से सरके कोई बादल,
रुख़ से नक़ाब जैसी सरकी मेरी ग़ज़ल !

सदियों का सफ़र कर के बस एक ही लम्हें में ,
मुट्ठी से रेत जैसी फिसली मेरी ग़ज़ल !

मैं आ गया समझ में शायद जनाब की,
वो फिर से पढ़ रहे हैं पिछली मेरी ग़ज़ल !

जिस मोड़ पे हमारी राहें जुदा हुईं थीं,
उस मोड़ पे हमेशा ठहरी मेरी ग़ज़ल !

अल्फ़ाज़ लिख रहा हैपढ़िये ज़रा संभल के,
कभी ज़हर तो कभी आग भी उगली मेरी ग़ज़ल !

||| अल्फ़ाज़ |||

ख़यालात = Thoughts, Imaginations, कल्पना
दश्त-ओ-बयाबान =  Desert And Wilderness
अरमान = Desire, Longing, Yearning, इच्छालालसा
आतिशाना = Fire-Like
शम्मा= Candle
रुख़ = Face, Appearance,on, Features
नक़ाब = Fem, Veil


मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

कशमकश

इतना जल्दी न दिल में बसा लीजिये,
थोड़ा उनका भी तो इम्तिहाँ लीजिये !

देखिये वो निगाहों का ठग तो नहीं,
यूँही ख़तरा न दिल का उठा लीजिये !

बात करता है तो बात कर लीजिये,
अपनी आदत न उसको बना लीजिये !

जीत लेने में उनको मज़ा है मगर,
कश्मकश का भी तो कुछ मज़ा लीजिये !

ज़ुल्फ़ को अपने रुख़ से हटा लीजिये !
तमन्नाई के दिल की दुआ लीजिये,

कौन कहता है दिल को लगा लीजिये,
दिल्लगी का भी तो कुछ मज़ा लीजिये !

गर्मियाँ उनके एहसास में ख़ूब हैं,
आप इन सर्दियों का मज़ा लीजिये !

जनवरी की तरह वो ज़रा दूर है,
बस दिसंबर सब्र से बिता लीजिये

सिर्फ़ दिल के कहे पे न ‘अल्फ़ाज़’ चल,
कुछ ज़हन का भी तो मशवरा लीजिये !

||| अल्फ़ाज़ |||

इम्तिहाँ = Test, Exam
ठग  = Cheat, Fraud
ख़तरा = Risk, Danger,
कश्मकश = Struggle, Wrangle, Tussle
ज़ुल्फ़ = A Curling Lock (Of Hair)Hanging Over The Temple Or Ear, Tresses
रुख़ = Face, Appearance, Direction, Features
तमन्नाई =  Desirer, Requestor 
दिल्लगी = Amusement, Merriment
एहसास = Feeling, Perception
ख़ूब = Good, Well, Beautiful, Pleasant
सब्र = Patience, Endurance
ज़हन = Mind, Knowledge
मशवरा = Counsel, Consultation

रविवार, 3 दिसंबर 2017

फ़ासले !!!

जान का क्या ग़म, एक ही बार तो जानी है,
ये सोच के ज़िन्दगी को रोज़ आज़माया हमने !

दिल ही आशना था तूफ़ान की मौजों से,
घर इसलिए ही साहिल पर था बनाया हमने !

आज फ़िर नमाज़ में तेरा ख़याल आया है,
आज फ़िर गुनाह-ए-शरियत दोहराया हमने !

क्या ख़बर थी की वो ख़ुदा पत्थर का है,
अपना मज़हब था जिसको बनाया हमने !

रिश्तों को निभाने की आदतें थी हमें,
कुछ ग़लतियों को भी आदतन निभाया हमने !

कौन होता है हमसफ़र गर्दिश के सितारे का,
परख कर देख लिया हर अपना पराया मैंने !

देख आज वो फ़िर आसरा मांगने आया है,
दिल की मिट्टी से घर जिसका बनाया हमने !

ये क्या लिख दिया फ़राज़ की बेवफ़ा है वो,
ये राज़ अब तलक सबसे था छुपाया हमने !

बताना था ज़माने को रुख़ हवाओं का,
ख़त के पुर्ज़ों को फ़ज़ा में उड़ाया हमने !

फ़ासले फ़िर वो नए देकर चला गया,
दूरियां मिटाने था जिसको बुलाया हमने !

|||फ़राज़|||

ग़म= Sorrow, Grief.
आशना= Intimate, Acquaintance.
मौज= Wave
साहिल= Beach, Coast.
गुनाह-ए-शरियत= A sin or crime according to Islamic law.
मज़हब= Religion
आदतन= Habitually
गर्दिश= Misfortune, Rotation, Circulation
आसरा= Shelter.
बेवफ़ा= Infidel.
ज़माना= The world, The era.
रुख़= Direction.
पुर्ज़े= Shreds, Pieces.
फ़ज़ा= Ambience.
फ़ासले= Distances, Spaces

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

कश्तियाँ काग़ज़ की !!!

डूब ही जाती हैं कश्तियाँ काग़ज़ की
हर बार ख़तायें लहरें नहीं करतीं !

वो हुनरमंद था जो किनारे पर रहा
हम उतरे थे दरिया, मगर पार न हुए !

कुछ सितारे चमकते हैं अमावास रातों में
मेरे दिल में किसी रात अँधेरा नहीं होता !

रोज़ बावक़्त मिलने चले आते हैं
रुख़ फेरते नहीं सितारे इन्सान की तरह !

तमाम उम्र बेवजह भी नहीं गुज़री ‘फ़राज़’
एक दौर में कोई तेरा अपना भी था !


||| फ़राज़ |||