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शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

इंतज़ार !!!

माना कि ये प्यार नहीं, कुछ और है,
दिल तेरा इंतज़ार फ़िर भी करता क्यूँ है !

दिल जानता है कि तेरी तलाश ख़सारे होंगे,
दिल तेरी गली से फ़िर भी गुज़रता क्यूँ है !

कभी चाँद ने देखा था वस्ल दो सितारों का,
मैं तो ग़र्दिश में हूँ मगर चाँद भटकता क्यूँ है !

तू तो छत पर सिर्फ़ मेरे लिए आता था,
तो अब भी चाँद रातों में निकलता क्यूँ है !

मेरे ज़िक्र पर वो अब भी चौंक जाता है,
ऐसा करता है, तो वो ऐसा करता क्यूँ है !

उसकी आँखों में अब कोई और बस गया है,
तू अभी तक उसके लिए संवारता क्यूँ है !

तू दिल्लगी ही कह देता इस रब्त को,
मोहब्बत को तू बदनाम करता क्यूँ है !

ज़हन को भी वो छू गया होगा 'फ़राज़',

हर इल्ज़ाम दिल पर ही धरता क्यूँ है !

|||फ़राज़|||


ख़सारे= Losses

वस्ल= Meeting, Union.
ग़र्दिश= Misfortune, Circulation, Rotation.
ज़िक्र= Narration, Remembrance, Talk.
रब्त= Connection, Relation, Bond, Intimacy.
ज़हन= Mind.
इल्ज़ाम= Blame

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

मैं !!!

तुझको अक्सर मैं छू के गुजरूँगा,
झौंका मैं इसी शहर की हवा का हूँ !

मेरा बचपन तेरे आँगन में भी तो खेला है,
बच्चा तो मैं पड़ोस के ही मकां का हूँ !

मुझको बहला न पाओगे तुम चराग़ों से,
मैं तलबगार तो सिर्फ़ कहकशां का हूँ !

अरे ओ मेरी रौशनी से जलने वालों,
अभी सितारा तो बस मैं सुबह का हूँ !

जानवर खाने का शौक़ मैं भी रखता हूँ,
मुसलमान मैं भी कहाँ ख़्वाह-मख़ाह का हूँ !

अज़ान के वक़्त तुम भी ज़रा ख़ामोश रहो,
यूँ तो पाबंद मैं भी गुनाह का हूँ !

मुझको हिंदी में मज़हब तुम सिखलाओ,
मैं आलिम कहाँ अरबी ज़बां का हूँ !

क्यूँ न हो ग़ुरूर मुझे अपनी हस्ती पर,
ज़र्रा तो मैं भी उसी ख़ुदा का हूँ !

ख़ुद की आग में जलके मैं मुनव्वर हूँ,
मैं कहाँ परवाना किसी शमा का हूँ !

मेरी रगों में भी बहता है गंगा का पानी
मैं मुसलमान हूँमगर हिन्दोस्तां का हूँ !!!

|||फ़राज़|||
मकां= House, Home.
चराग़= An Oil Lamp.
तलबगार= Seeker, Claimant, Desirous.
कहकशां= The Galaxy, The Milky Way.
शौक़= Fondness, Desire, Ardor
ख़्वाह-मख़ाह= Simply, For No Reason, Just Like That.
अज़ान= The Islamic Call To Prayer
पाबंद= Punctual.
मज़हब= Religion.
आलिम= Scholar, Learned, Intelligent.
अरबी= Arabic
ज़बां= Tongue, Speech.
ग़ुरूर= Proud.
ज़र्रा= An Atom, A Particle.
मुनव्वर= Illuminated, Enlightened.
परवाना= Moth.

शमा= Candle.

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

कश्तियाँ काग़ज़ की !!!

डूब ही जाती हैं कश्तियाँ काग़ज़ की
हर बार ख़तायें लहरें नहीं करतीं !

वो हुनरमंद था जो किनारे पर रहा
हम उतरे थे दरिया, मगर पार न हुए !

कुछ सितारे चमकते हैं अमावास रातों में
मेरे दिल में किसी रात अँधेरा नहीं होता !

रोज़ बावक़्त मिलने चले आते हैं
रुख़ फेरते नहीं सितारे इन्सान की तरह !

तमाम उम्र बेवजह भी नहीं गुज़री ‘फ़राज़’
एक दौर में कोई तेरा अपना भी था !


||| फ़राज़ |||

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

तलाश

अपनी ही तलाश में निकला हूँ सफ़र को,
मौला तराश दे तू मेरे हुनर को !

एक फ़लसफ़ा यूँ लिखूं की बन जाये दास्ताँ,
कारीगरी सिखा दे तू नाक़ाम बशर को !

उन लम्हों को गुज़रे सदियाँ गुज़र गयीं,
वो तेरा छत पे आना भरी दोपहर को !

शायद गुज़रे वो शाम को फ़िर मेरी गली से,
हर रोज़ हूँ सजाता सितारों से मैं घर को !

वो चाँद बन के आता है शामों को फ़लक़ पे,
हर रात है गुज़री, तकते तेरे सफ़र को !

ले इम्तेहान तू मेरा पर मांगता हूँ ये,
मौला ज़रा बढ़ा दे तू मेरे सब्र को !

माना के ये अमावास बरसों से चल रही है,
एक तारा ही है काफ़ी निकलूं जब मैं सफ़र को !

तेरी रज़ा से मुमकिन हर काम हो गए, 
हूँ मांगता दुआ में तुझसे उस नज़र को !

फ़राज़...