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रविवार, 19 नवंबर 2017

अगरचे!!!

सरगुज़िश्त अपनी पढ़नी थी,
रु-ब-रु ख़ुद के मैंने आईना रखा !
हर पल में है मैंने जीना सीखा,
हौसला मैंने इस तरह रखा !

पड़ोस भी घर सा लगता है,
दरीचा उधर का भी खुला रखा !
ग़रज़ सवाब की रही हो या न हो,
दरवाज़े पर अपने उजाला रखा !

कलमे की शहादत भी मैं देता हूँ,
मयकदों से भी मैंने सिलसिला रखा !
राब्ता मस्जिद से यूँ तो कम है अपना,
अगरचे दिल में हमेशा ख़ुदा रखा !

किसीकी फ़िक्र करने लगा हूँ मैं,
ये राज़ उस ही से है मैंने छुपा रखा !
अजब कारोबार है इश्क़ का 'फ़राज़',
जिसमें हार जाने में ही नफ़ा रखा !

|||फ़राज़|||

सरगुज़िश्त= biography
रु-ब-रु= In front of, Face to face.
हौसला= Courage
दरीचा= Window.
ग़रज़= Intention, Purpose.
सवाब= Reward of good deeds.
कलमा= The Muslim confession of faith.
शहादत= Testimony, Witness.
मयकदा= Bar, Tavern.
राब्ता= Contact
अगरचे= Although.
फ़िक्र= Concern
अजब= Amazing, Wonderful.
कारोबार= Business, Trade, Affair.
नफ़ा= Profit.

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

दिवाली !!!

इस दिवाली अँधेरा कुछ यूँ मिटाया मैंने,
एक दिया मस्जिद में भी जलाया मैंने !

मज़हबी दीवार में खोल के मन की खिड़की,
मंदिर को मस्जिद से कुछ यूँ मिलाया मैंने !

एक रूठा हुआ दोस्त फ़िर नज़र आया,
भूलकर शिक़ायतें गले उसको लगाया मैंने !

एक दिये की लौ में जब तू नज़र आया,
हर दिया फ़िर तुझे याद करके जलाया मैंने !

ग़रज़ थी अपने पड़ोस को खुशबू से भरना,
घर अपना उनके लिए था महकाया मैंने !

पड़ोसी की एक दीवार भी सज गई थी,
यूँ तो घर बस अपना था सजाया मैंने !

तेरे आँगन में भी फल और छाँव देगा,
शजर जो अपने आँगन में है लगाया मैंने !

माना कि जायज़ नहीं मुसलमान पर लेकिन,
उस्ताद के पैरों को हाथ था लगाया मैंने !

|||फ़राज़|||

मज़हबी= Religious.
ग़रज़= Intention, Purpose.
शजर= Tree
जायज़= Legitimate. Prevailing.
उस्ताद= Teacher. 

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

मैं !!!

तुझको अक्सर मैं छू के गुजरूँगा,
झौंका मैं इसी शहर की हवा का हूँ !

मेरा बचपन तेरे आँगन में भी तो खेला है,
बच्चा तो मैं पड़ोस के ही मकां का हूँ !

मुझको बहला न पाओगे तुम चराग़ों से,
मैं तलबगार तो सिर्फ़ कहकशां का हूँ !

अरे ओ मेरी रौशनी से जलने वालों,
अभी सितारा तो बस मैं सुबह का हूँ !

जानवर खाने का शौक़ मैं भी रखता हूँ,
मुसलमान मैं भी कहाँ ख़्वाह-मख़ाह का हूँ !

अज़ान के वक़्त तुम भी ज़रा ख़ामोश रहो,
यूँ तो पाबंद मैं भी गुनाह का हूँ !

मुझको हिंदी में मज़हब तुम सिखलाओ,
मैं आलिम कहाँ अरबी ज़बां का हूँ !

क्यूँ न हो ग़ुरूर मुझे अपनी हस्ती पर,
ज़र्रा तो मैं भी उसी ख़ुदा का हूँ !

ख़ुद की आग में जलके मैं मुनव्वर हूँ,
मैं कहाँ परवाना किसी शमा का हूँ !

मेरी रगों में भी बहता है गंगा का पानी
मैं मुसलमान हूँमगर हिन्दोस्तां का हूँ !!!

|||फ़राज़|||
मकां= House, Home.
चराग़= An Oil Lamp.
तलबगार= Seeker, Claimant, Desirous.
कहकशां= The Galaxy, The Milky Way.
शौक़= Fondness, Desire, Ardor
ख़्वाह-मख़ाह= Simply, For No Reason, Just Like That.
अज़ान= The Islamic Call To Prayer
पाबंद= Punctual.
मज़हब= Religion.
आलिम= Scholar, Learned, Intelligent.
अरबी= Arabic
ज़बां= Tongue, Speech.
ग़ुरूर= Proud.
ज़र्रा= An Atom, A Particle.
मुनव्वर= Illuminated, Enlightened.
परवाना= Moth.

शमा= Candle.

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

दस्तक

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...

पर कुछ निशानियाँ बच गयी होंगी
बंद अलमारी के किसी कोने में,
अपने कुछ पुराने कपड़ों के बीच
जो तुमने छुपा के रखी थीं !

पर शायद अब वो फूल न होगा,
जो तुमने अपनी एक डायरी में,
मुलाक़ात के साथ रख छोड़ा था,
तेरी लिखावट में मेरे निशान बाकी होंगे !

कुछ लम्हें आज भी सिमटे मिल जाएँगे
गुज़रे कल की धुंधली तस्वीरों में,
पर कुछ लम्हों को तो तुमने
महज़ यादों में ही खंगाला होगा !

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...
थक के लौट आती है तेरे दर से
अक्सर मेरी मायूस दस्तक !

कुछ लोग बारहा वहां अब भी रहते हैं,
पर अब वहां वो नहीं रहता,
जो मेरी हलकी सी आहट सुनकर,
          घरवालों से हज़ार बहाने करके,
दौड़ के आ जाता था खिड़की पर,
कभी छ्त, तो कभी दरवाज़े पर!


मेरे ख़याल मुझे ही छल कर,
अक्सर उस गली में ले जाते हैं,
दस्तक उस दर पर देते हैं,
पर कोई जवाब नहीं आता !

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...