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शनिवार, 23 मार्च 2019

बंजारे

छत, खिड़की और दीवारे हैं,
घर में हो के बंजारे हैं !

उन आँखों में सच्चाई है,
जिनमें अश्क़ों के धारे हैं !

ये अश्क़ हैं तेरी यादों के,
कुछ मीठे हैंकुछ खारे हैं !

उनके वादे और उनके ख़त,
अब काग़ज़ के तय्यारे हैं !

हो कर भी साथ नहीं होते,
इक दरिया के दो किनारे हैं !

सब रिश्ते परखे जाएँगे,
गर्दिश में अभी सितारे हैं !

'अल्फ़ाज़सुलगते हैं क्यूंकि,
दिल में जलते अंगारे हैं !

||| अल्फ़ाज़ |||

बंजारा = Gypsy, Homeless
अश्क़ = Tear
धारा = Current, A Stream
खारा = Salty
तय्यारा = Airplane, Aerostat
दरिया = River
किनारा = Coast, Bank
गर्दिश = Circulation, Misfortune

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

!!! रंग !!!

अब तो हर मौसम में
ज़रा और फीका पड़ जाता है,
रंग बालों का,
रंग ख़यालों का
और,
रंग मलालों का !

उस दीवार-घड़ी ने
बदलते देखे हैं 
कैलेण्डर,
न जाने कितने सालों के  !
सोचता हूँ कि वक़्त न सही,
इस बार
घड़ी ही बदल दूँ !

उस खिड़की पर भी
बदले जा चुके हैं
कई पुराने परदे,
लेकिन
तुम्हारे होने का एहसास
बाक़ी है
उस तकिये में,
और मुझमें !

मैं ख़ुद को तसल्ली दूँ,
या ख़ुद से ही मैं जंग करूँ !
ऐ-रंग-ए-ग़म-ए-यार,
बता क्या मैं तेरा रंग करूँ !

||| फ़राज़ |||

मौसम= season
ज़रा= A bit
फीका= Insipid, Faded, Languid
ख़यालों= Thoughts
मलालों= Regrets.
सालों= Years.
वक़्त= Time
परदे= Veil
एहसास= Feeling
तकिया= Pillow
ख़ुद= Self
तसल्ली= Solace, Consolation
जंग= Battle, War
रंग-ए-ग़म-ए-यार= Color of beloved's sorrow.


शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

दिवाली !!!

इस दिवाली अँधेरा कुछ यूँ मिटाया मैंने,
एक दिया मस्जिद में भी जलाया मैंने !

मज़हबी दीवार में खोल के मन की खिड़की,
मंदिर को मस्जिद से कुछ यूँ मिलाया मैंने !

एक रूठा हुआ दोस्त फ़िर नज़र आया,
भूलकर शिक़ायतें गले उसको लगाया मैंने !

एक दिये की लौ में जब तू नज़र आया,
हर दिया फ़िर तुझे याद करके जलाया मैंने !

ग़रज़ थी अपने पड़ोस को खुशबू से भरना,
घर अपना उनके लिए था महकाया मैंने !

पड़ोसी की एक दीवार भी सज गई थी,
यूँ तो घर बस अपना था सजाया मैंने !

तेरे आँगन में भी फल और छाँव देगा,
शजर जो अपने आँगन में है लगाया मैंने !

माना कि जायज़ नहीं मुसलमान पर लेकिन,
उस्ताद के पैरों को हाथ था लगाया मैंने !

|||फ़राज़|||

मज़हबी= Religious.
ग़रज़= Intention, Purpose.
शजर= Tree
जायज़= Legitimate. Prevailing.
उस्ताद= Teacher. 

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

दस्तक

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...

पर कुछ निशानियाँ बच गयी होंगी
बंद अलमारी के किसी कोने में,
अपने कुछ पुराने कपड़ों के बीच
जो तुमने छुपा के रखी थीं !

पर शायद अब वो फूल न होगा,
जो तुमने अपनी एक डायरी में,
मुलाक़ात के साथ रख छोड़ा था,
तेरी लिखावट में मेरे निशान बाकी होंगे !

कुछ लम्हें आज भी सिमटे मिल जाएँगे
गुज़रे कल की धुंधली तस्वीरों में,
पर कुछ लम्हों को तो तुमने
महज़ यादों में ही खंगाला होगा !

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...
थक के लौट आती है तेरे दर से
अक्सर मेरी मायूस दस्तक !

कुछ लोग बारहा वहां अब भी रहते हैं,
पर अब वहां वो नहीं रहता,
जो मेरी हलकी सी आहट सुनकर,
          घरवालों से हज़ार बहाने करके,
दौड़ के आ जाता था खिड़की पर,
कभी छ्त, तो कभी दरवाज़े पर!


मेरे ख़याल मुझे ही छल कर,
अक्सर उस गली में ले जाते हैं,
दस्तक उस दर पर देते हैं,
पर कोई जवाब नहीं आता !

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...