yaad लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
yaad लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 13 जुलाई 2019

बरसात


हमारी शायरी में फ़िर तुम्हारी बात आती है,
बहुत कुछ याद आता है कि जब बरसात आती है !

||| अल्फ़ाज़ |||

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

याद


आँखें ही नहीं, दिल भी हल्का हो जायेगा,
ये अश्क़ बहते हैं तो बह जाने दीजिये !

जितना रोकोगे, वो याद उतना आएगा,
वो याद आता है तो याद आने दीजिये !

सुना है कि अब उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता,
छोड़िये, अब आप भी जाने दीजिये !

उसके नाम के साथ मेरा नाम तो आ जाता है,
लोग इल्ज़ाम लगते हैं तो लगाने दीजिये !

अब तो रूठने में ही मज़ा आने लगा है,
वो मनाता है तो अब मनाने दीजिये !

लौट आएगा अगर वो अपना होगा,
'फ़राज़' वो जाता है तो उसे जाने दीजिये !

||| फ़राज़ |||

अश्क़= Tears
फ़र्क़= Difference
इल्ज़ाम= Blame

सोमवार, 15 जनवरी 2018

ख़ैर-ख़बर

हमने समझा था कि दिल संभल गया होगा,
जाने क्या बात है कि आँख भर आती है !

न पूछ क़िस्सा तू मेरी मोहब्बत का,
चोट सीने की पुरानी सी उभर आती है !

पलकों पे छोड़ जाती है भीगे लम्हें,
दिल में जब यादों की लहर आती है !

माना कि तू मेरा कोई नहीं लगता,
अच्छा लगता है जब ख़ैर-ख़बर आती है !

कि वो क़ुर्बत नहीं, महज़ तिजारत है,
वो मोहब्बत, जो शर्तों पर आती है !

नाख़ुदा का किरदार भी पता चल जाता है,
कश्तियाँ 'फ़राज़' जब बीच भंवर आती हैं !

||| फ़राज़ |||

क़िस्सा= Tale, Story.
ख़ैर-ख़बर= News/ Information of wellness/goodness.
क़ुर्बत= vicinity, nearness.
महज़= Merely, Only
तिजारत= Trade, Commerce.
शर्त= Condition, Term, Stipulation.
नाख़ुदा= Boatman, Sailor, Captain/Commander of the ship.
किरदार= Character.
कश्ती= Boat.
भंवर= whirlpool vertex.

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

मैं तुझमें सो जाता हूँ !

जब रूठे दिल को अपने
ख़ुद ही बहलाना पड़ता है !
जब मन की हर एक उलझन को
खुद ही सुलझाना पड़ता है !

जब सावन इस मन बंजर को
तुम जैसा सींच नहीं पाता !
और तकिये का एक हिस्सा
जब ख़ाली- ख़ाली लगता है !

तब दिल के इन अंधेरों में
मैं तेरी याद जलाता हूँ !
तू मुझमें जलती रहती है
मैं ही तुझमें सो जाता हूँ !

||| फ़राज़ |||

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

तू नहीं आया !


आज दिल ने फ़िर एक शिक़ायत की,
आज फ़िर छोड़ जाने तू नहीं आया !

हमने लाख रौशन कीं तेरी गलियां,
मेरी एक याद जलाने तू नहीं आया !

लोग अक्सर सवाल पूछते हैं कैसे कैसे,
ज़माने को झुठलाने कभी तू नहीं आया !

क्या कोई चुभन तेरे भी दिल में है बाक़ी ,
महज़ अफ़सोस जताने तो तू नहीं आया !

मेरी ख़ुशियों की तिजारत करने वाले,
मेरे ज़ख्मों को मिटाने तू नहीं आया !

तू ज़ख्म देकर ही सुकून पाता है,
बारहा मरहम लगाने तू नहीं आया !

क्या हक़ीकत थी नाक़ाम रिश्ते की,
बातें हज़ार समझाने तू नहीं आया !

तुझको फ़िर भुला दिया, कि कोई चारा न था,
कोई कसम कोई रिवायत निभाने तू नहीं आया !

ज़िक्र-ए-फ़ितरत तू न कर मुझसे ‘फ़राज़’,
कभी मुक़म्मिल हो जाने तू नहीं आया !


फ़राज़....

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

दस्तक

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...

पर कुछ निशानियाँ बच गयी होंगी
बंद अलमारी के किसी कोने में,
अपने कुछ पुराने कपड़ों के बीच
जो तुमने छुपा के रखी थीं !

पर शायद अब वो फूल न होगा,
जो तुमने अपनी एक डायरी में,
मुलाक़ात के साथ रख छोड़ा था,
तेरी लिखावट में मेरे निशान बाकी होंगे !

कुछ लम्हें आज भी सिमटे मिल जाएँगे
गुज़रे कल की धुंधली तस्वीरों में,
पर कुछ लम्हों को तो तुमने
महज़ यादों में ही खंगाला होगा !

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...
थक के लौट आती है तेरे दर से
अक्सर मेरी मायूस दस्तक !

कुछ लोग बारहा वहां अब भी रहते हैं,
पर अब वहां वो नहीं रहता,
जो मेरी हलकी सी आहट सुनकर,
          घरवालों से हज़ार बहाने करके,
दौड़ के आ जाता था खिड़की पर,
कभी छ्त, तो कभी दरवाज़े पर!


मेरे ख़याल मुझे ही छल कर,
अक्सर उस गली में ले जाते हैं,
दस्तक उस दर पर देते हैं,
पर कोई जवाब नहीं आता !

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

कसम


यही बेहतर है की अब तुमको भूल जाऊं मैं,
दिल बेवजह अपना और न दुखाऊँ मैं

मेरे हालात की ख़बर भी न हो तुमको
राज़ कोई दफ़न सीने में हो जाऊं मैं

तेरे ख्यालों के चराग़ हैं दिल में रोशन
बुझा कर वो ख़यालात ख़ुद ही बुझ जाऊं मैं

याद तो सब है, बस याद नहीं करना है
बात हर लम्हा यही ख़ुद को समझाऊँ मैं

कभी तो ताबीर-ए-ख़्वाब मुझपर भी हो
पर क्या करूँ जो रातों को न सो पाऊँ मैं

तुम याद करो वादे जो पूरे न किये
मुझे है रंज की अब भी क्यूँ निभाऊँ मैं

ली थी कसम कि तुमको न भूलेंगे कभी
ली थी कसम, तो तुमको कैसे भुलाऊँ मैं

बुधवार, 28 सितंबर 2016

और फ़िर तन्हाई...

रात है, चाँद है, और फ़िर तन्हाई,
रात चराग़ों में फ़िर जली हो जैसे !
ये तेरी आहट, कि बढ़ गयी धड़कन,
ये तेरा साया, कि तू मिली हो जैसे !

दिल में तक़लीफ़ सी जगी हो जैसे,
याद फ़िर सीने में चुभी हो जैसे,
ये ख़याल फ़िर तेरे न होने का,
चोट कोई फ़िर छिल गई हो जैसे !

इतनी क़ुर्बत कि हर पल की ख़बर रहती थी,
इतनी दूरी कि कोई दुश्मनी हो गई हो जैसे,
बात करती है तो बस ज़ख्म देती है,
देखती यूँ है कि कोई अजनबी हो जैसे !

है क्या दीवानगी, ये तमन्ना धुंधली सी,
उसके आने की कोई आस बची हो जैसे !
वक़्त-ए-रुख़सत तूने मुड़कर न देखा पीछे...
ज़िन्दगी साथ मेरा छोड़ चली हो जैसे...

|||फराज़|||

बुधवार, 21 सितंबर 2016

अभी ताज़ा है ज़ख्म, थोड़ा अभी सह लेने दो..



आज मुझे अपनी गहराइयों में छुप के रह लेने दो..
आज मुझे ज़रा देर चुप रह लेने दो..

अभी मैं बिखरा हूँ, कुछ वक़्त में सिमट जाऊँगा..
अभी सोया हूँ, जब जागूँगा तो निखर जाऊँगा..
मेरे हालात से तुम न परेशान न होना..
मैं हूँ दरिया, समंदर नहीं, जो ठहर जाऊँगा..
अभी ताज़ा है ज़ख्म, थोड़ा अभी सह लेने दो..
आज मुझे ज़रा देर चुप रह लेने दो..

अभी बाक़ी हैं हवास, कोई बात न मैं समझूंगा..
एक पैमाना और कर दूँ ख़ाली, तो कुछ समझूंगा..
अभी ज़िन्दगी के कुछ घूँट भी हैं पीना बाक़ी..
जो कुछ बूँदें ही मिल जाएँ तो ग़नीमत समझूंगा..

मुझसे ख़्वाबों में भी ना कोई रिश्ता रखना..
इतना है कहना, इतना ही बस कह लेने दो..
अभी ताज़ा है ज़ख्म, थोड़ा अभी सह लेने दो..
आज मुझे ज़रा देर चुप रह लेने दो...

आज भी याद है जब तुमने कुछ कहा भी न था..
तुम ही आँखों में, ख़्वाबों में, मेरी ज़िन्दगी में थे..
आज भी याद हैं ठिकाने तुझसे मिलने के..
आज भी कानों में तेरी सी सदा आती है..
ये, और कुछ और बातें, जो अधूरी रह गयीं..
आज फिर ये बातें मुझे खुद से कह लेने दो..
अभी ताज़ा है ज़ख्म, थोड़ा अभी सह लेने दो..

आज मुझे ज़रा देर चुप रह लेने दो...

मंगलवार, 20 सितंबर 2016



क्या मेरे ख़याल पर आज भी तू ठहरा होगा ?
क्या मेरे नाम को फ़िर चुपके से पुकारा होगा ?
कभी फ़ुर्सत में मेरी यादों में गुम हो के,
मेरे अहसास को आग़ोश में उतरा होगा?

क्या फिर कभी माथे पे लटकती लट को
उतने ही करीने से फिर संवारा होगा ?
कभी यूँही जो ढूंढोगे गुज़रे सालों में,
मिल जायगा वो लम्हा जो साथ गुज़ारा होगा..

इसे वक़्त का तक़ाज़ा कहो या मेरी लाचारगी,
है क़ुबूल हर फ़ैसला जो भी तुम्हारा होगा..
अब न कोई आंसू न दर्द रहा बाक़ी,
पर क्या होगा, जो मुझसे सवाल तुम्हारा होगा..

यादों की दराज़ों में महफूज़ वो गुज़रे लम्हें,
सीने में क़ैद कोई मलाल जो तुम्हारा होगा..
कफ़न में लिपट कर न जाने कितनी आरज़ुएं,
सो जाएंगी ज़ेर-ए-कब्र जब विसाल हमारा होगा !!!