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सोमवार, 4 जून 2018

अश्क़ !!!

दर्द-ए-दिल ग़ज़ल में बयाँ करके रो लिए,
तन्हाई को फ़िर दास्ताँ सुना करके रो लिए !

किसको सुनाएँ दर्द कि सब ग़ैर हो गए हैं,
तकलीफ़ सारी ख़ुद को सुना करके रो लिए !

तेरा नाम को न सुन लें कहीं ये ज़माने वाले,
सीने में हिचकियों को दबा करके रो लिए !

शिकवा तेरी जफ़ा का, करते भी हम तो किस से,
इल्ज़ाम सारे ख़ुद पे लगा करके रो लिए !

की भूलने की कोशिश, और याद करके रोये,
हर बार ख़ुद को ही आज़मा करके रो लिए !

मज़मून जिनका दिल सेमिटता नहीं मिटाए,
तेरे उन्ही ख़तों को जला करके रो लिए !

यूँ भी हुआ कि एक दिन सौदाई हो गए,
ख़ुद को ही ख़ुद हँसाया और हंसा करके रो लिए !

रोये हम इस क़दर कि आँसू भी न बचे जब,
अपने लहू को अश्क़ बना करके रो लिए !

जुर्म-ए-वफ़ा की हमने ख़ुद को सज़ा ये दी है,
ख़ुद को ही ख़ुद का मुजरिम बता करके रो लिए !

तमाशा मेरी वफ़ा का न देख ले ये दुनिया,
तकिये में अपने मुँह को छुपा करके रो लिए !

जागे जो नींद से तो जाना की ख़्वाब था वो,
पहलू में हम तुझे न पा करके रो लिए !

रोता था मैं तो मुझपे हँसते थे ये उजाले,
'फ़राज़हम चराग़ों को बुझा कर के रो लिए !

||| फ़राज़ |||

दर्द-ए-दिल= Heart's Grief, Heartache, Grief, Sorrow, Anguish
बयाँ= Description, Narrative, Statement
तन्हाई= Loneliness, Privacy, Solitude
दास्ताँ= Story, Fable, Tale
ग़ैर= Stranger, Unacquainted
तकलीफ़= Pain, Affliction
शिकवा= Complaint, Reproach
जफ़ा = Oppression, Injust
इल्ज़ाम= Blame, Accusation
आज़मा= Try, Test
मज़मून= Article, Subject Matter.
सौदाई= Insane, Mad
क़दर= Amount
अश्क़= Tears
जुर्म-ए-वफ़ा= Guilty/Crime Of Faithfulness/Loyalty
बारहा= Many Times
मुजरिम= Criminal
तमाशाShow, Exhibition,
वफ़ा= Fidelity, Faithfulness
पहलू= Side, Flank
ख़्वाब= Dream
चराग़= An Oil Lamp.

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

मेरा हमदर्द !!!

उसकी बातों में हैं चमकते जुगनू,
और पलकों तले उजली सी सहर रखता है !

उसकी गर्दिश है ज़हन में हर लम्हा,
वो मेरी हर सोच में घर रखता है !

उसकी आहटें है पुरवाइयाँ तसल्ली की,
बनके सबा साँसों में गुज़र रखता है !

है मेरे हवासों में आवारगी उसकी,
वो मेरी सुध-बुध पे असर रखता है !

देखता है तो चाक़ जिगर करता है,
दुश्मन-ए-जां शमशीर-ए-नज़र रखता है !

देखता है तो पुरसुकून सा करता है,
बोलता है तो तबियत में सबर रखता है !

उसका दामन छू जाते हैं मेरे आंसू,
मेरा हमदर्द मेरी खैर ख़बर रखता है !


फ़राज़...

मंगलवार, 20 सितंबर 2016



क्या मेरे ख़याल पर आज भी तू ठहरा होगा ?
क्या मेरे नाम को फ़िर चुपके से पुकारा होगा ?
कभी फ़ुर्सत में मेरी यादों में गुम हो के,
मेरे अहसास को आग़ोश में उतरा होगा?

क्या फिर कभी माथे पे लटकती लट को
उतने ही करीने से फिर संवारा होगा ?
कभी यूँही जो ढूंढोगे गुज़रे सालों में,
मिल जायगा वो लम्हा जो साथ गुज़ारा होगा..

इसे वक़्त का तक़ाज़ा कहो या मेरी लाचारगी,
है क़ुबूल हर फ़ैसला जो भी तुम्हारा होगा..
अब न कोई आंसू न दर्द रहा बाक़ी,
पर क्या होगा, जो मुझसे सवाल तुम्हारा होगा..

यादों की दराज़ों में महफूज़ वो गुज़रे लम्हें,
सीने में क़ैद कोई मलाल जो तुम्हारा होगा..
कफ़न में लिपट कर न जाने कितनी आरज़ुएं,
सो जाएंगी ज़ेर-ए-कब्र जब विसाल हमारा होगा !!!