क्या मेरे ख़याल पर आज भी तू
ठहरा होगा ?
क्या मेरे नाम को फ़िर चुपके
से पुकारा होगा ?
कभी फ़ुर्सत में मेरी यादों
में गुम हो के,
मेरे अहसास को आग़ोश में उतरा
होगा?
क्या फिर कभी माथे पे लटकती
लट को
उतने ही करीने से फिर संवारा
होगा ?
कभी यूँही जो ढूंढोगे गुज़रे
सालों में,
मिल जायगा वो लम्हा जो साथ
गुज़ारा होगा..
इसे वक़्त का तक़ाज़ा कहो या
मेरी लाचारगी,
है क़ुबूल हर फ़ैसला जो भी
तुम्हारा होगा..
अब न कोई आंसू न दर्द रहा
बाक़ी,
पर क्या होगा, जो मुझसे सवाल
तुम्हारा होगा..
यादों की दराज़ों में महफूज़ वो
गुज़रे लम्हें,
सीने में क़ैद कोई मलाल जो
तुम्हारा होगा..
कफ़न में लिपट कर न जाने कितनी
आरज़ुएं,
सो जाएंगी ज़ेर-ए-कब्र जब
विसाल हमारा होगा !!!
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