सोमवार, 19 सितंबर 2016

हर रात ख़्वाबों में



हर रात ख़्वाबों में आते हो ख़ामोशी के साथ,
कुछ बिसरी सी यादें लिए, सरगोशी के साथ,
न दो दस्तक ख़्वाबों के किवाड़ों पर,
आज सोया हूँ आग़ोश में तेरी परछाईं के साथ..

तेरे वादों का दिल पे कुछ तो भरम बाक़ी है,
शायद बाक़ी है धड़कन, पर कुछ कम बाक़ी है,
न हसरत, न दुआ, न कोई इल्तिजा बाक़ी,
बस मैं हूँ बाक़ी मेरी तन्हाई के साथ..

हर करवट पे तेरा झूठा गुमान बाक़ी है,
कोई रिश्ता नहीं बाक़ी, बस पहचान बाक़ी है,
मेरी चाँद बेख़बर है मेरी अमावास रातों से,
अब तन्हा है सफ़र मेरा आवारगी के साथ!!!

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