एक उम्र गुज़र गयी इंतज़ार
में
हूँ दर-ब-दर कि ठिकाना
नहीं मिलता..
फ़क़त दुनिया ही नहीं
अजनबी लगती
आईने में भी अब मेरा
चेहरा नहीं मिलता..
मक़तूल हूँ मैं, तेरा
राज़दार भी हूँ
जुर्म का तेरे और कोई
गवाह नहीं मिलता..
तुम लौटना भी चाहो तो
हैरत होगी
कोई बेवफ़ा कभी बेवजह
नहीं मिलता..
लोग कहते थे की मोहब्बत
अनमोल है
मैं जानता हूँ की दौलत
से क्या नहीं मिलता..
तूने मंदिर में ढूंढा,
मैंने मस्जिद में तलाशा
जो अन्दर है, बाहर वो
ख़ुदा नहीं मिलता..
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