रविवार, 18 सितंबर 2016

अहद-ए-वफ़ा !!!


कब तलक दर्द मैं बेवजह लिखूं,
सोचता हूँ आज तेरा अहद-ए-वफ़ा लिखूं !
लिखूं मोहब्बत में डूबी तेरी बातें,
कि आज तेरा चेहरा ख़फ़ा-ख़फ़ा लिखूं !

लगता है चाँद तेरी बिंदिया जैसा,
सोचता हूँ कि चाँद को तेरा गहना लिखूं !
चलो लिखता हूँ तेरा चेहरा चाँद के जैसा,
फ़िर सोचता हूँ कि अब चाँद को क्या लिखूं ?

रखता हूँ आज भी तेरे ख़त मैं क़रीने से,
तेरी हर याद को मैं अपना ज़ाना लिखूं !
मेरी आवाज़ पर जो दौड़ा चला आता था,
मैं कैसे उसका लौटकर न आना लिखूं !

वक़्त की सिफ़त है बदलते रहना,
चल वक़्त की तरह तेरा बदलना लिखूं !
लिख दूँ तुझसे पहले-पहल मिलना,
या मिलकर 'फ़राज़' से तेरा बिछड़ना लिखूं!!!

||| फ़राज़ |||

अहद-ए-वफ़ा = promise of constancy
क़रीने= decorations
ज़ाना= Treasure
पहले-पहल= Initially, Beginning

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