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शनिवार, 29 सितंबर 2018

ख़त

थी इक नई जलन सीजब ख़त जला पुराना,
लपटों में दिख रहा थागुज़रा हुआ ज़माना !

सोचा कि फ़िर से इक ख़तलिख करके मैं जला दूँ,
जो भूल सब गया हैमैं भी उसे भुला दूँ !

मुश्किल ये कशमकश थीमुश्किल ये फ़ैसला था,
जब हर्फ़ वो जले थेमैं साथ में जला था !

थी राख में नुमाया उस चेहरे की बनावट,
जलकर भी मिट न पाईउन हाथों की लिखावट !

जिन उँगलियों से लिक्खेतुमने हज़ार वादे,
जिन हाथों की हिना में महके मेरे इरादे !

उस याद के धुएँ में महकी वही हिना है,
मैं जिसकी हर ख़ुशी था, वो ख़ुश मेरे बिना है !

इस राख में सुलगते हैं राज़ अब भी बाक़ी,
एहसास बुझ गए हैं, ‘अल्फ़ाज़’ अब भी बाक़ी !

||| अल्फ़ाज़ |||

ख़त= Letter
ज़माना= Time, World, Era
कशमकश= Struggle, Wrangle, Tug Of War
फ़ैसला= Decision
हर्फ़= Alphabet
राख= Ashes
नुमाया= Apparent, Conspicuous, Prominent, Visible
हिना= Henna
इरादे= Intentions, Will, Desires
एहसास= Feeling

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

जिस्म का साया !!!

जिसकी हसरत का चराग़ मैंने जलाया था,
उसने ही मेरा पता हवाओं को बताया था !

तूने जो देखा वो तो बस तेरा ही चेहरा था,
मैंने तो सिर्फ़ आईना तुझको दिखाया था !

प्यार के साथ हर झगड़ा भी ख़त्म हो गया,
और उसको लगा कि उसने मुझे हराया था !

मेरे नाम की सरग़ोशियाँ बाक़ी हैं तेरी महफ़िल में,
बदनामियाँ ही सही, इश्क़ में कुछ तो कमाया था !

शायद तुझको भी मेरी कोई बात चुभती हो,
मुझे फूलों ने ठुकराया, काँटों ने सहलाया था !

राहतें भी तो अब मुझे तिश्नगी से मिलती हैं,
मुझे बारिश ने तरसाया, बंजर ने अपनाया था !

आज मिला वो किसी और की परछाईं बनकर,
कल तलक जो 'फ़राज़' के जिस्म का साया था !

|||फ़राज़|||

हसरत= Desire
सरग़ोशियाँ= whisper, gossip
महफ़िल = Assembly, Party, Gathering.
बदनामियाँ= Notorities.
तिश्नगी= Thirst, Longing.



शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

वक़्त की रेत सा तू हाथों से बह गया...

क़तरा वो स्याही सा क़ाग़ज़ पर रह गया,
अश्क़ों की स्याही से अशआर कह गया...
फिर से जो खंगाली दास्तान अपनी,
एक लम्हा आँखों के साहिल से बह गया...

एक झूठी हक़ीकत, एक बिसरी कहानी,
एक आरज़ू ख़्वाब में वो फिर से दे गया...
ये क्या दीवानगी, कि अब भी मुस्कुराता है,
तन्हाइयों के ज़ख्म जो तन्हा ही सह गया...

ये मेरी फुरक़त कि तू नहीं हासिल,
वक़्त की रेत सा तू हाथों से बह गया...
मुझको भी हुनर अता हो अदाकारी का,
कैसे लिखूं की दूर तू किस तरह गया...

वक़्त की धूल है आइनों पर जम गई,
परछाईंया है मेरी, पर चेहरा रह गया...
जो था मेरी हक़ीकत, ख़ुद ख़्वाब हो गया,
जाने वाले तू ये क्या ताबीर कह गया...

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

निशानियाँ



ये न सोचा था की फ़ासला इतना होगा,
तेरी तस्वीर होगी पर तेरा चेहरा न होगा !

दूरियों की धुंध छाती थी, छंट जाती थी,
अबकी जो धुंध छंटी तो भी सवेरा न होगा !

मैं न सही पर कुछ निशानियाँ तो बाक़ी होंगी,
एक सूखा गुलाब किताबों में अब भी रखा होगा !

यूँ तो बहुत कुछ है जो अभी अनकहा ही रह गया,
अनकहा ही रहेगा जो फ़िर न कभी सामना होगा,

तुमसे ही शुरू हुए और तुम पर ही ख़त्म,
इससे बेहतर न मेरी कहानी का तर्जुमा होगा !!!

|||फ़राज़|||

रविवार, 18 सितंबर 2016

अहद-ए-वफ़ा !!!


कब तलक दर्द मैं बेवजह लिखूं,
सोचता हूँ आज तेरा अहद-ए-वफ़ा लिखूं !
लिखूं मोहब्बत में डूबी तेरी बातें,
कि आज तेरा चेहरा ख़फ़ा-ख़फ़ा लिखूं !

लगता है चाँद तेरी बिंदिया जैसा,
सोचता हूँ कि चाँद को तेरा गहना लिखूं !
चलो लिखता हूँ तेरा चेहरा चाँद के जैसा,
फ़िर सोचता हूँ कि अब चाँद को क्या लिखूं ?

रखता हूँ आज भी तेरे ख़त मैं क़रीने से,
तेरी हर याद को मैं अपना ज़ाना लिखूं !
मेरी आवाज़ पर जो दौड़ा चला आता था,
मैं कैसे उसका लौटकर न आना लिखूं !

वक़्त की सिफ़त है बदलते रहना,
चल वक़्त की तरह तेरा बदलना लिखूं !
लिख दूँ तुझसे पहले-पहल मिलना,
या मिलकर 'फ़राज़' से तेरा बिछड़ना लिखूं!!!

||| फ़राज़ |||

अहद-ए-वफ़ा = promise of constancy
क़रीने= decorations
ज़ाना= Treasure
पहले-पहल= Initially, Beginning

शनिवार, 10 सितंबर 2016



एक उम्र गुज़र गयी इंतज़ार में
हूँ दर-ब-दर कि ठिकाना नहीं मिलता..

फ़क़त दुनिया ही नहीं अजनबी लगती
आईने में भी अब मेरा चेहरा नहीं मिलता..

मक़तूल हूँ मैं, तेरा राज़दार भी हूँ
जुर्म का तेरे और कोई गवाह नहीं मिलता..

तुम लौटना भी चाहो तो हैरत होगी
कोई बेवफ़ा कभी बेवजह नहीं मिलता..

लोग कहते थे की मोहब्बत अनमोल है
मैं जानता हूँ की दौलत से क्या नहीं मिलता..

तूने मंदिर में ढूंढा, मैंने मस्जिद में तलाशा
जो अन्दर है, बाहर वो ख़ुदा नहीं मिलता..