qatra लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
qatra लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 14 मार्च 2017

लम्हें !!!

फ़ुर्सत की अलमारी के
एक ख़ामोश से कोने में
ढूंढ रहे थे हम
न जाने यादें किसकी,
अहसासों पर से  
लम्हों की धूल हटाई
तो शाया हुए ऐसे भी वर्क़
जहाँ लम्हें महफूज़ थे
एक काग़ज़ में लिपटे !

कुछ बोलते से लफ्ज़ मिले
जिनमें लिखावट मेरी न थी
तुमने कुछ लिखा था
मेरे लिए,
कुछ नीले रंग से
तो कुछ ख़ास अहसास
लाल रंग से !

स्याहियां उम्रदराज़ हो गयीं
तेरे धड़कते अहसासों से,
लोगों के बदल जाने से
यादें नहीं बदला करतीं !

एक फूल मिला
मेरी तरह मुरझाया सा
अकेलेपन से !
कि अब ख़ुशबू न थी उसमें,
फ़िर भी यूँ महसूस हुआ
जैसे हवा का कोई झौंका
मुझतक आया है
तुमको छू कर !
और मुझमे बस गया हो
हमेशा के लिए
तुम्हारी तरह !

एक गीली सी शाम मिली
और वो पहली बारिश
जब साथ भीगे थे,
हम और तुम !
मन का वो हिस्सा
आज भी गीला है,
और मेरी पलकों को
अक्सर गीला कर जाता है,
क़तरा-क़तरा बरसता है आँखों से
और मेरे ही लिखे अल्फ़ाज़ों को
धुंधला कर जाता है !!!

||| फ़राज़ |||

गुरुवार, 2 मार्च 2017

वो आँखों से ठग लेता है

वो पंछी मेरी मन बगिया
ख़्वाबों को चुनने आता है !
वो आँखों से ठग लेता है
वो बातों से छू जाता है !

बेरंग सी मेरी हस्ती को
वो रंग नए से देता है !
किरदार से काँटों को चुनकर
मन फूलों सा कर देता है !

वो बेफ़िक्री की बातों से
मेरी फ़िक्रें झुठलाता है !
जब आता है वो इस दिल में
सबकुछ रौशन कर देता है !

वो राह है जैसे जन्नत की
ताउम्र मुसाफ़िर हो जाऊं !
उस राह का जोगी बन जाऊं
ताउम्र मुहाजिर हो जाऊं !

एक बेपरवाह मुस्कान सा वो
अक्सर होठों पर आता है !
वो क़तरा आंसू का बनकर
इन आँखों से बह जाता है !

| फ़राज़ |

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

वक़्त की रेत सा तू हाथों से बह गया...

क़तरा वो स्याही सा क़ाग़ज़ पर रह गया,
अश्क़ों की स्याही से अशआर कह गया...
फिर से जो खंगाली दास्तान अपनी,
एक लम्हा आँखों के साहिल से बह गया...

एक झूठी हक़ीकत, एक बिसरी कहानी,
एक आरज़ू ख़्वाब में वो फिर से दे गया...
ये क्या दीवानगी, कि अब भी मुस्कुराता है,
तन्हाइयों के ज़ख्म जो तन्हा ही सह गया...

ये मेरी फुरक़त कि तू नहीं हासिल,
वक़्त की रेत सा तू हाथों से बह गया...
मुझको भी हुनर अता हो अदाकारी का,
कैसे लिखूं की दूर तू किस तरह गया...

वक़्त की धूल है आइनों पर जम गई,
परछाईंया है मेरी, पर चेहरा रह गया...
जो था मेरी हक़ीकत, ख़ुद ख़्वाब हो गया,
जाने वाले तू ये क्या ताबीर कह गया...