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बुधवार, 5 अप्रैल 2017

फ़ितरत !!!

तूफ़ान से उलझकर 
सीखा है मैंने जलना,
खायी हज़ार ठोकर
आया है तब संभलना !

एक सिम्त जो हूँ डूबा,
एक सिम्त उग रहा हूँ,
फ़ितरत में हैं उजाले
सीखा न मैंने ढलना !

हर शब तू इम्तेहान ले,
मत भूल मेरी ज़िद को,
मैं शम्स हूँ सहर का
हर रोज़ है निकलना !

अपनी ही उलझनों से
सुलझाये कुछ हुनर हैं,
दरिया सा मुझको बहना,
पुरवाइयों सा चलना !

अहसास की ज़ुबान के
अल्फाज़ तर्जुमा है,
अग़ाज़ कुछ हैं लिखने,
अंजाम हैं बदलना !

शब= Night, रात
सिम्त= Directions, दिशा!
फ़ितरत= Nature, स्वभाव
शम्स= Sun, सूरज
दरिया= River, नदी

||| फ़राज़ |||


मंगलवार, 14 मार्च 2017

लम्हें !!!

फ़ुर्सत की अलमारी के
एक ख़ामोश से कोने में
ढूंढ रहे थे हम
न जाने यादें किसकी,
अहसासों पर से  
लम्हों की धूल हटाई
तो शाया हुए ऐसे भी वर्क़
जहाँ लम्हें महफूज़ थे
एक काग़ज़ में लिपटे !

कुछ बोलते से लफ्ज़ मिले
जिनमें लिखावट मेरी न थी
तुमने कुछ लिखा था
मेरे लिए,
कुछ नीले रंग से
तो कुछ ख़ास अहसास
लाल रंग से !

स्याहियां उम्रदराज़ हो गयीं
तेरे धड़कते अहसासों से,
लोगों के बदल जाने से
यादें नहीं बदला करतीं !

एक फूल मिला
मेरी तरह मुरझाया सा
अकेलेपन से !
कि अब ख़ुशबू न थी उसमें,
फ़िर भी यूँ महसूस हुआ
जैसे हवा का कोई झौंका
मुझतक आया है
तुमको छू कर !
और मुझमे बस गया हो
हमेशा के लिए
तुम्हारी तरह !

एक गीली सी शाम मिली
और वो पहली बारिश
जब साथ भीगे थे,
हम और तुम !
मन का वो हिस्सा
आज भी गीला है,
और मेरी पलकों को
अक्सर गीला कर जाता है,
क़तरा-क़तरा बरसता है आँखों से
और मेरे ही लिखे अल्फ़ाज़ों को
धुंधला कर जाता है !!!

||| फ़राज़ |||

शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

ख़त

आज तेरा ख़त जला दिया मैंने,
राख़ के पुर्ज़े से हुए अहसास मेरे!

राख़ के रंगत से स्याह दिखते हैं,
क्या रंग लाये हैं अल्फाज़ तेरे!

बोझ से आज पलकें बंद कर ली मैंने
बरसों तलक उठाये हमने नाज़ तेरे!

तुझपे यकीं तो था, इल्म-ए-ग़ैब न था
आहिस्ता आहिस्ता खुले हैं राज़ तेरे!

आज सफ़र का रुख़ कर लेते हैं,
बहुत मुन्तज़िर रह लिए फ़राज़ तेरे!

फ़राज़....

रविवार, 25 दिसंबर 2016

एक ख़्वाब का सौदा !!!

हर रात मैं अपनी नींदों से
एक ख़्वाब का सौदा करता हूँ !
है ख़्वाब, तो टूट ही जाना है
पर नींदें ख़र्चा करता हूँ !

तू बनके ख़्वाब सिरहाने पर
तकिये पर अक्सर मिलता है !
हौले-हौले थपकी देकर
तू दूर कहीं ले जाता है !

जहाँ वक़्त के धागे लम्हों को
बंधन में बाँध नहीं पाते !
जहाँ उम्र थमी है बरसों से
जहाँ साथ थी भीगी बरसातें !

कुछ लम्हे जो थे ख़्वाब हुए
अब ख़्वाब में अक्सर मिलते हैं !
एक हसरत की सूरत बनकर
अहसास से बनकर मिलते हैं !

चादर पर सिलवट के जैसा तू
मन में सिलवट दे जाता है !
पलकों की मुंडेरों को तू
फिर से तर कर जाता है !

हर रात मैं अपनी नींदों से
एक ख़्वाब का सौदा करता हूँ !
है ख़्वाब, तो टूट ही जाना है
पर नींदें ख़र्चा करता हूँ !


|||फ़राज़|||

रविवार, 27 नवंबर 2016

सिलसिला

अहसास फ़िर एक दबा सा ढूंढ लिया,
दिल ने दर्द का फ़िर पता ढूंढ लिया !

बेज़ार हो चला था दिल सुकूनियत से,
दिल आज़ारी का फ़िर मरहला ढूंढ लिया !

एक उम्र तलक रहे हैं आवारगी के दिन,
थके हुए क़दमों ने फ़िर आशियाँ ढूंढ लिया !

उससे शिक़ायत क्या करूँ की ग़ैर है वो,
ख़ुद से ही आज फ़िर गिला ढूंढ लिया !

अहसासों को तलाश थी अल्फ़ाज़ों की,
फिर से एक राज़ छुपा सा ढूंढ लिया !

सब इल्ज़ाम मैंने अपने नाम कर लिए,
पर तू न मिला, मैंने बेइन्तेहा ढूंढ लिया !

मेरे तू ख़्वाबों में भी ख़्वाब हो गया,
रतजगों का मैंने सिलसिला ढूंढ लिया !

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

इल्तिजा!!!

ऐ ख़ुदाहुनर तू मुझे इतना दे दे,
मेरे अहसास को लफ़्ज़ों में तर्जुमा दे दे !

ताउम्र भटकता रहा हूँ मुहाजिर जैसा,
ज़िन्दगी की सख़्तियों को सायबान दे दे !

नस्ल-ए-आदम का हर राज़ जानने वाले,
मुझको भी अपनी हस्ती के निशां दे दे !

वसाविस की गिरफ़्त में है हस्ती मेरी,
मेरे दिल को कोई नेक मशवरा दे दे !

ले इम्तिहान तू बेशक़पर इल्तिजा भी सुन,
सब्र करने का तू मुझे हौसला दे दे !

ये कैसी आज़माइश, कि रूह भी क़ैद है,
मेरी परवाज़ को तू मेरा आसमान दे दे !

रूह झुलसी है सफ़र-ए-आतिशां करते,
मेरी आवारगी को तू आशियाँ दे दे !

बहुत रुसवा हैं तेरा सजदा करने वाले,
ख़ुदारा इस क़ौम को भी तू कर्बला दे दे !

गुनाह भी करता है और तेरा सजदा भी,
मौला 'फ़राज़' को इबादत का सलीक़ा दे दे !

|||फ़राज़|||

तर्जुमा= Translation.
ताउम्र= Lifelong. All life.
मुहाजिर= Refugee, Emigrant.
सख़्तियां= Hardships, Rigidities.
नस्ल-ए-आदम= Ancestry of Adam.
निशां= Mark, Sign.
वसाविस= Evil thoughts, Bad thoughts.
गिरफ़्त= Lock, Objection
मशवरा= Consultation, Suggestion.
इल्तिजा= Request, Plead.
आज़माइश= Examination, Trail, Test.
परवाज़= Flight.
सफ़र-ए-आतिशां= Journey of fire.
आवारगी= Wandering, Waywardness.
आशियाँ= Nest, Shelter
ख़ुदारा= O God.
क़ौम= Tribe, Race, People.
कर्बला= A place in Iraq where Imam Hussain was assassinated and buried in a holy war.
रुसवा= Dishonored, Despondent.
सजदा= Bowing in Prayer so as to touch the ground with the forehead.
मौला= God.
सलीक़ा= Good manner, Discreet of good disposition.


गुरुवार, 17 नवंबर 2016

दहलीज़

एक सिहरन सी मेरी रगों में दौड़ती है,
सांस तेरी मुझे छू के गई हो जैसे !
बेसाख़्ता ही मुस्कुरा दिया एक ख़याल से मैं,
तेरी बातों में आज भी कोई गुदगुदी हो जैसे !

तेरी गर्दिश मेरे ज़हन में यूँ रहती है,
मेरी धड़कन से बाक़ी तेरी दोस्ती हो जैसे !
तेरे वजूद को ढूंढती हैं अक्सर बाहें,
मुझमें बाक़ी सी तेरी तिश्नगी हो जैसे !

हर अपने की अपनाईयत से वाकिफ़ हूँ,
धुंध आँखों से मेरी छंट गयी हो जैसे !
कल मैं गुज़रा था फ़िर तेरी गलियों से,
वो दीवार-ओ-दर अब अजनबी हों जैसे !

मेरे नाम से अब भी तू चौंक सा जाता है,
फांस कोई सीने में चुभी रह गयी हो जैसे !
तेरे अहसास ने फिर टटोला यूँ मेरे दिल को,
मेरी दहलीज़ पर आज भी तू खड़ी हो जैसे !

|||फ़राज़|||