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रविवार, 1 जुलाई 2018

कि तुम जो आ गए हो !!!

कि तुम जो आ गए हो
तो चलो ऐसा करें,
कि वक़्त से कहें
ज़रा आहिस्ता गुज़र !
या घड़ियों को ही बंद कर दें,
और थाम लें हर उस पल को,
कि जिसमें तुम साथ हो !

वक़्त क़ीमती सा लगने लगा है,
कि तुम जो आ गए हो !

कि तुम जो आ गए हो
तो खो जाएँ चलो,
कहीं ऐसी जगह
जहाँ निगाह जहाँ तलक जाए,
कोई दूसरा न हो,
बस एक मैं हूँ,
बस एक तुम हो,

ख़्वाब पूरा सा हो रहा है
कि तुम जो आ गए हो !

कि तुम जो आ गए हो
तो एक इरादा है,
कि ज़िन्दगी को जियेंगे
ज़िन्दगी की तरह,
क्या ख़बर कि कल बिछड़ना हो,
हर पल को जियेंगे
आख़िरी की तरह,

कुछ अधूरा सा था, जो पूरा हो रहा है,
कि तुम जो आ गए हो !!!

कि तुम जो आ गए हो 
तो यूँ लगता है,
कि मेरा होना इतना भी बेवजह तो नहीं !
कई मक़सद हैं मुस्कुराने के,
कई मक़सद हैं ख़्वाब सजाने के,
कई मक़सद हैं रात जागने के,
और कई मक़सद हैं चाँद ताकने के,
और एक मक़सद है
हर बार दुआ मांगने का !

दुआओं पे यकीन आ गया है,
कि तुम जो आ गए हो !

||| फ़राज़ |||


आहिस्ता= Slowly, Gently, Softly.

निगाह= A look, Glance, Attention
यक़ीन= Confidence, Trust
तलक= Till
इरादा= Will, Desire, Intention
खबर = News, Information
आख़िरी= Last, Final.
मक़सद= Purpose, Object,

शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

ख़त

आज तेरा ख़त जला दिया मैंने,
राख़ के पुर्ज़े से हुए अहसास मेरे!

राख़ के रंगत से स्याह दिखते हैं,
क्या रंग लाये हैं अल्फाज़ तेरे!

बोझ से आज पलकें बंद कर ली मैंने
बरसों तलक उठाये हमने नाज़ तेरे!

तुझपे यकीं तो था, इल्म-ए-ग़ैब न था
आहिस्ता आहिस्ता खुले हैं राज़ तेरे!

आज सफ़र का रुख़ कर लेते हैं,
बहुत मुन्तज़िर रह लिए फ़राज़ तेरे!

फ़राज़....