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सोमवार, 10 जून 2019

पागल


तकलीफ़न कोई हलचल है,
शायद अब दर्द मुसलसल है !

अब उसके बिना अधूरा हूँ,
अब मेरा इश्क़ मुकम्मल है !

ये कह के उसने ठुकराया,
शायर हैशायद पागल है !

दिखती है क़त्ल की तैयारी,
उनकी आँखों में काजल है !

कुछ अब भी गुज़रा करता है
,
हाँलाकि वो गुज़रा कल है !

तहज़ीब ही उनका गहना है,
वो जिनके सर पे आँचल है !

जीने की अज़ीयत क्या जाने,
जिनके बिस्तर में मख़मल है !

सच्चाई की
जाँ को ख़तरा है,
'अल्फ़ाज़शहर अब मक़्तल है !

||| अल्फ़ाज़ |||

तकलीफ़ = Trouble, Difficulty, कष्टपीड़ा
हलचल = Tumult, Turmoil, कोलाहल
मुसलसल  = Regular, Successive, लगातार, जारी
मुकम्मल  = Perfect, Complete, सम्पूर्णपूर्णतयः
क़त्ल = Murder, हत्या
अज़ीयत = Trouble, Suffering, कष्ट
मख़मल = Velvet
तहज़ीब = Politeness, Civilization, सभ्यता
आँचल = Veil, दुपट्टा
जाँ = life, existence, जीवन
मक़्तल = A Place Of Slaughter Or Execution, वधशाला

रविवार, 1 जुलाई 2018

कि तुम जो आ गए हो !!!

कि तुम जो आ गए हो
तो चलो ऐसा करें,
कि वक़्त से कहें
ज़रा आहिस्ता गुज़र !
या घड़ियों को ही बंद कर दें,
और थाम लें हर उस पल को,
कि जिसमें तुम साथ हो !

वक़्त क़ीमती सा लगने लगा है,
कि तुम जो आ गए हो !

कि तुम जो आ गए हो
तो खो जाएँ चलो,
कहीं ऐसी जगह
जहाँ निगाह जहाँ तलक जाए,
कोई दूसरा न हो,
बस एक मैं हूँ,
बस एक तुम हो,

ख़्वाब पूरा सा हो रहा है
कि तुम जो आ गए हो !

कि तुम जो आ गए हो
तो एक इरादा है,
कि ज़िन्दगी को जियेंगे
ज़िन्दगी की तरह,
क्या ख़बर कि कल बिछड़ना हो,
हर पल को जियेंगे
आख़िरी की तरह,

कुछ अधूरा सा था, जो पूरा हो रहा है,
कि तुम जो आ गए हो !!!

कि तुम जो आ गए हो 
तो यूँ लगता है,
कि मेरा होना इतना भी बेवजह तो नहीं !
कई मक़सद हैं मुस्कुराने के,
कई मक़सद हैं ख़्वाब सजाने के,
कई मक़सद हैं रात जागने के,
और कई मक़सद हैं चाँद ताकने के,
और एक मक़सद है
हर बार दुआ मांगने का !

दुआओं पे यकीन आ गया है,
कि तुम जो आ गए हो !

||| फ़राज़ |||


आहिस्ता= Slowly, Gently, Softly.

निगाह= A look, Glance, Attention
यक़ीन= Confidence, Trust
तलक= Till
इरादा= Will, Desire, Intention
खबर = News, Information
आख़िरी= Last, Final.
मक़सद= Purpose, Object,

बुधवार, 20 जून 2018

डर !!!

तेरे ख़्वाब के पूरा होने से डर जाता हूँ,
मैं फ़िर से अधूरा होने से डर जाता हूँ !

परछाइयाँ भी तो साथ छोड़ जाती हैं,
मैं अब अँधेरा होने से डर जाता हूँ !

सच बात कहता हूँ तो लोग रूठ जाते हैं,
आजकल आईना होने से डर जाता हूँ !

बे-वजह ही मुझपे इल्ज़ाम लग जाते हैं,
अब तो मुसलमां होने से डर जाता हूँ !

जानता हूँ कि बिछड़ने का दर्द क्या है,
लोगों के अपना होने से डर जाता हूँ !

तुम वो नहीं रहे जो तुम हुआ करते थे,
मैं फ़िर से तुम्हारा होने से डर जाता हूँ !

कोई भी तो दिल से अच्छा नहीं कहता,
इस दौर का हुक्मराँ होने से डर जाता हूँ !

अपनी कलम पे बंदिश मैं लगा नहीं सकता,
मैं अपने बे-ज़बां होने से डर जाता हूँ !

अख़बार की सुर्ख़ियोँ जब मैं पढ़ता हूँ,
'फ़राज़' मैं अच्छा होने से डर जाता हूँ !

||| फ़राज़ |||

ख़्वाब = Dream
बे-वजह = Without Cause
इल्ज़ाम = Blame
मुसलमां = The Muslim
दौर = Era, Age
हुक्मराँ = Ruler
बंदिश = Closure, Stoppage
बे-ज़बां = Tongue less, Speechless.
सुर्ख़ियाँ = Headlines.