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बुधवार, 20 जून 2018

डर !!!

तेरे ख़्वाब के पूरा होने से डर जाता हूँ,
मैं फ़िर से अधूरा होने से डर जाता हूँ !

परछाइयाँ भी तो साथ छोड़ जाती हैं,
मैं अब अँधेरा होने से डर जाता हूँ !

सच बात कहता हूँ तो लोग रूठ जाते हैं,
आजकल आईना होने से डर जाता हूँ !

बे-वजह ही मुझपे इल्ज़ाम लग जाते हैं,
अब तो मुसलमां होने से डर जाता हूँ !

जानता हूँ कि बिछड़ने का दर्द क्या है,
लोगों के अपना होने से डर जाता हूँ !

तुम वो नहीं रहे जो तुम हुआ करते थे,
मैं फ़िर से तुम्हारा होने से डर जाता हूँ !

कोई भी तो दिल से अच्छा नहीं कहता,
इस दौर का हुक्मराँ होने से डर जाता हूँ !

अपनी कलम पे बंदिश मैं लगा नहीं सकता,
मैं अपने बे-ज़बां होने से डर जाता हूँ !

अख़बार की सुर्ख़ियोँ जब मैं पढ़ता हूँ,
'फ़राज़' मैं अच्छा होने से डर जाता हूँ !

||| फ़राज़ |||

ख़्वाब = Dream
बे-वजह = Without Cause
इल्ज़ाम = Blame
मुसलमां = The Muslim
दौर = Era, Age
हुक्मराँ = Ruler
बंदिश = Closure, Stoppage
बे-ज़बां = Tongue less, Speechless.
सुर्ख़ियाँ = Headlines.