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शनिवार, 29 सितंबर 2018

ख़त

थी इक नई जलन सीजब ख़त जला पुराना,
लपटों में दिख रहा थागुज़रा हुआ ज़माना !

सोचा कि फ़िर से इक ख़तलिख करके मैं जला दूँ,
जो भूल सब गया हैमैं भी उसे भुला दूँ !

मुश्किल ये कशमकश थीमुश्किल ये फ़ैसला था,
जब हर्फ़ वो जले थेमैं साथ में जला था !

थी राख में नुमाया उस चेहरे की बनावट,
जलकर भी मिट न पाईउन हाथों की लिखावट !

जिन उँगलियों से लिक्खेतुमने हज़ार वादे,
जिन हाथों की हिना में महके मेरे इरादे !

उस याद के धुएँ में महकी वही हिना है,
मैं जिसकी हर ख़ुशी था, वो ख़ुश मेरे बिना है !

इस राख में सुलगते हैं राज़ अब भी बाक़ी,
एहसास बुझ गए हैं, ‘अल्फ़ाज़’ अब भी बाक़ी !

||| अल्फ़ाज़ |||

ख़त= Letter
ज़माना= Time, World, Era
कशमकश= Struggle, Wrangle, Tug Of War
फ़ैसला= Decision
हर्फ़= Alphabet
राख= Ashes
नुमाया= Apparent, Conspicuous, Prominent, Visible
हिना= Henna
इरादे= Intentions, Will, Desires
एहसास= Feeling

गुरुवार, 4 जनवरी 2018

एक अरमां !

मौसम-ए-सर्द आया है फ़ज़ा-ए-दिल में,
दिल के कोने में फ़िर ठिठुरता है एक अरमां !

बर्फ़ की झील के जैसे ठहरे मेरे मन में,
राख़ में शोले सा सुलगता है एक अरमां !

जाने किस दर्द में मुब्तला दिल इतना है,
कि दम-ब-दम आह भरता है एक अरमां !

रूह भी छोड़ ही जाती है एक रोज़ जिस्म को,
दिल-ए-बर्बाद से कब निकलता है एक अरमां !

कभी लबों पे भी आ जाता है हंसी बन कर,
कभी आँखों से भी छलकता है एक अरमां !

ये बस अरमां है, कोई हक़ीकत तो नहीं,
क्यूँ पशेमां है जो बिखरता है एक अरमां !

किसकी उम्मीद में चराग़ाँ करता है तू,
किसकी हुज़ूर में संवारता है एक अरमां !

एक पतंगे की मौत रोज़ मरता है 'फ़राज़'
एक शम्मा पे रोज़ मचलता है एक अरमां !

|||फ़राज़|||

मौसम-ए-सर्द= Season of winters.
फ़ज़ा-ए-दिल= Open and extensive area of the heart.
अरमां= Desire, Longing.
मुब्तला= Afflicted, Distressed.
दम-ब-दम= Every moment, Continuously.
आह= Sigh, Moan.
दिल-ए-बर्बाद= Ruined heart.
लब= Lips.
हक़ीक़त= Reality, Condition, State.
पशेमां= Embarrassed, Penitent.
चराग़ाँ= Illumination, Display of lamps.
हुज़ूर= Presence of a superior authority.
पतंगा= Moth.
रोज़= Every day.
शम्मा= Candle.


शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

ख़त

आज तेरा ख़त जला दिया मैंने,
राख़ के पुर्ज़े से हुए अहसास मेरे!

राख़ के रंगत से स्याह दिखते हैं,
क्या रंग लाये हैं अल्फाज़ तेरे!

बोझ से आज पलकें बंद कर ली मैंने
बरसों तलक उठाये हमने नाज़ तेरे!

तुझपे यकीं तो था, इल्म-ए-ग़ैब न था
आहिस्ता आहिस्ता खुले हैं राज़ तेरे!

आज सफ़र का रुख़ कर लेते हैं,
बहुत मुन्तज़िर रह लिए फ़राज़ तेरे!

फ़राज़....