शनिवार, 29 सितंबर 2018

ख़त

थी इक नई जलन सी, जब ख़त जला पुराना,
लपटों में दिख रहा था, गुज़रा हुआ ज़माना !

सोचा कि फ़िर से इक ख़त, लिख करके मैं जला दूँ,
जो भूल सब गया है, मैं भी उसे भुला दूँ !

मुश्किल ये कशमकश थी, मुश्किल ये फ़ैसला था,
जब हर्फ़ वो जले थे, मैं साथ में जला था !

थी राख में नुमाया उस चेहरे की बनावट,
जलकर भी मिट न पाई, उन हाथों की लिखावट !

जिन उँगलियों से लिक्खे, तुमने हज़ार वादे,
जिन हाथों की हिना में महके मेरे इरादे !

उस याद के धुएँ में महकी वही हिना है,
मैं जिसकी हर ख़ुशी था, वो ख़ुश मेरे बिना है !

इस राख में सुलगते हैं राज़ अब भी बाक़ी,
एहसास बुझ गए हैं, ‘अल्फ़ाज़’ अब भी बाक़ी !

||| अल्फ़ाज़ |||

ख़त= Letter
ज़माना= Time, World, Era
कशमकश= Struggle, Wrangle, Tug Of War
फ़ैसला= Decision
हर्फ़= Alphabet
राख= Ashes
नुमाया= Apparent, Conspicuous, Prominent, Visible
हिना= Henna
इरादे= Intentions, Will, Desires
एहसास= Feeling

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