गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

शायरी

मेरे दिल को जो ग़म की ख़बर हो गई,

शायरी किस क़दर बा-हुनर हो गई!

 

हम तेरे इश्क़ में मुब्तला यूँ हुए,

लोग कहते हैं हमको नज़र हो गई!

 

अर्श क्या, अब लबों तक पहुँचती नहीं,

कितनी मेरी दुआ बे-असर हो गई!

 

रात कैसे कटेगी तुम्हारे बिना,

सोचते-सोचते फिर सहर हो गई!

 

रूप उसका हमें तेरे जैसा लगा,

आग पानी में जब तर-ब-तर हो गई!

 

इस ख़ुशी से कहीं मर ही जाएँ न हम,

आज उनको हमारी फ़िकर हो गई!

 

अब ज़रा में तबीयत बिगड़ जाती है,

लग रहा है हमारी उमर हो गई!

 

मेरे लहजे में तल्ख़ी ज़माने की थी,

मुझको ‘अल्फ़ाज़’ कैसे शकर हो गई!

||| अल्फ़ाज़ |||

 

बा-हुनर = प्रतिभावान, Talented

अर्श =आसमान, Sky

मुब्तला = ग्रस्त, Infest

सहर = प्रातःकाल, सवेरा, Morning

तर-ब-तर = सराबोर, Dranch

लहजा = भाव, Tone

तल्ख़ी = कड़वाहट, Bitterness

शकर = मधुमेह, Diabetes

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें