शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

हाज़िरी

 

हंसती आँखों में ग़म की नमी आ गई,

लो बिछड़ने कि आख़िर घड़ी आ गयी!

 

यूँ तो कुछ भी मेरा वो नहीं ले गया,

उसके जाने से फिर भी कमी आ गयी!

 

जब भी संभले क़दम मस्जिदों में गए,

जब भी बहके तुम्हारी गली आ गयी!

 

उसको ख़ुश देख कर मैं सबर कर गया,

मेरे आड़े मेरी ही ख़ुशी आ गयी!

 

ज़िन्दगी दूर ज़्यादा तो मुझसे न थी,

मैंने आवाज़ दी, दौड़ती आ गई!

 

इससे बेहतर कोई सिलसिला न हुआ,

प्यार बन करके जब दोस्ती आ गई!

 

चूर तूफ़ाँ का सारा गुमाँ हो गया,

नाव साहिल पे जब काग़ज़ी आ गयी!

 

लफ़्ज़ ख़ुद ही कलम से निकलने लगे,

मुझपे अल्फ़ाज़की हाज़िरी आ गई!

||| अल्फ़ाज़ |||

गुमाँ = भ्रम,  Fancy, Doubt, Suspicion

हाज़िरी = उपस्थिति,  Presence, Attendance

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