हंसती आँखों में ग़म की नमी आ गई,
लो बिछड़ने कि आख़िर घड़ी आ गयी!
यूँ तो कुछ भी मेरा वो नहीं ले गया,
उसके जाने से फिर भी कमी आ गयी!
जब भी संभले क़दम मस्जिदों में गए,
जब भी बहके तुम्हारी गली आ गयी!
उसको ख़ुश देख कर मैं सबर कर गया,
मेरे आड़े मेरी ही ख़ुशी आ गयी!
ज़िन्दगी दूर ज़्यादा तो मुझसे न थी,
मैंने आवाज़ दी, दौड़ती आ गई!
इससे बेहतर कोई सिलसिला न हुआ,
प्यार बन करके जब दोस्ती आ गई!
चूर तूफ़ाँ का सारा गुमाँ हो गया,
नाव साहिल पे जब काग़ज़ी आ गयी!
लफ़्ज़ ख़ुद ही कलम से निकलने लगे,
मुझपे ‘अल्फ़ाज़’ की हाज़िरी आ गई!
||| अल्फ़ाज़ |||
गुमाँ = भ्रम, Fancy,
Doubt, Suspicion
हाज़िरी
= उपस्थिति, Presence, Attendance
Behatrin Intikhaab
जवाब देंहटाएंBemisaal