शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

ज़ख़्म

उसकी गलियों से अब मैं गुज़रता नहीं,
भूल कर भी मैं ये भूल करता नहीं !

बात उसकी चली तो ये याद आ गया,
इश्क़ मैं भी तो अब उससे करता नहीं !

सबको कहते सुना, इश्क़ है एक नशा,
है नशा तो नशा क्यूँ उतरता नहीं !

पूछ मयकश से दिल की तू वीरानियाँ,
जाम खाली किया, दिल ये भरता नहीं !

वक़्त सुनता नहीं बात मेरी कभी,
जो ठहरता न था, वो गुज़रता नहीं !

ज़ख़्म का मुंतज़िर ख़ुद ही 'अल्फ़ाज़' है,
है तड़पता मगर आह भरता नहीं !

||| फ़राज़ |||

मयकश= Drunkard
वीरानियाँ= Loneliness
ज़ख़्म= Wound
मुंतज़िर= Anticipative, Expectant

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