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शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

ज़ख़्म

उसकी गलियों से अब मैं गुज़रता नहीं,
भूल कर भी मैं ये भूल करता नहीं !

बात उसकी चली तो ये याद आ गया,
इश्क़ मैं भी तो अब उससे करता नहीं !

सबको कहते सुना, इश्क़ है एक नशा,
है नशा तो नशा क्यूँ उतरता नहीं !

पूछ मयकश से दिल की तू वीरानियाँ,
जाम खाली किया, दिल ये भरता नहीं !

वक़्त सुनता नहीं बात मेरी कभी,
जो ठहरता न था, वो गुज़रता नहीं !

ज़ख़्म का मुंतज़िर ख़ुद ही 'अल्फ़ाज़' है,
है तड़पता मगर आह भरता नहीं !

||| फ़राज़ |||

मयकश= Drunkard
वीरानियाँ= Loneliness
ज़ख़्म= Wound
मुंतज़िर= Anticipative, Expectant

शनिवार, 26 मई 2018

तो हमको चैन पड़े !!!

वो फ़िर बुलाएँ तो हमको चैन पड़े,
पर हम न जाएँ तो हमको चैन पड़े !

यूँ तो रूठ कर सुकून ज़्यादा है,
पर वो मनाएँ तो हमको चैन पड़े !

उनके चेहरे पे नदामत हो और,
हम मुस्कुराएँ तो हमको चैन पड़े !

मेरे सवालों पे पशेमां हो के,
वो आँसू बहाएं तो हमें चैन पड़े !

वो रोएँ हमसे लिपट कर के और,
हमको भी रुलाएँ तो हमको चैन पड़े !

ज़माना बेवफ़ा कहता है उनको,
वो ख़ुद बताएँ तो हमको चैन पड़े !

उनकी वफ़ा को भी बेवफ़ाई से,
कोई आज़माये तो हमको चैन पड़े !

उनसे भी कोई वादे करके,
न निभाये तो हमें चैन पड़े !

जिसे वो चाहते हैं वही उनका,
दिल दुखाए तो हमको चैन पड़े !

काश यूँ हो कि कोई उनको भी,
छोड़ जाए तो हमको चैन पड़े !

हमसे नहीं तो हमारी ग़ज़ल से ही,
वो दिल लगाएँ तो हमको चैन पड़े !

उनकी ही तरह हम भी उनको,
भूल जाएँ तो हमको चैन पड़े !

शायद तमन्ना अब भी यही दिल में है,
कि वो लौट आएँ तो हमको चैन पड़े !

'फ़राज़' ये जीतने वाले हमसे,
हार जाएँ तो हमको चैन पड़े !

||| फ़राज़ |||


चैन= Comfort, Ease, Happiness, Peace
सुकून= Peace, Rest, Tranquility
नदामत= Regret, Repentance, Shame
पशेमां= Embarrassed/ Penitent
बेवफ़ा= Faithless, Treacherous
वफ़ा= Fidelity, Faithful
शायद= Perhaps
तमन्ना= Wish, Desire, Inclination, Request

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

कसम


यही बेहतर है की अब तुमको भूल जाऊं मैं,
दिल बेवजह अपना और न दुखाऊँ मैं

मेरे हालात की ख़बर भी न हो तुमको
राज़ कोई दफ़न सीने में हो जाऊं मैं

तेरे ख्यालों के चराग़ हैं दिल में रोशन
बुझा कर वो ख़यालात ख़ुद ही बुझ जाऊं मैं

याद तो सब है, बस याद नहीं करना है
बात हर लम्हा यही ख़ुद को समझाऊँ मैं

कभी तो ताबीर-ए-ख़्वाब मुझपर भी हो
पर क्या करूँ जो रातों को न सो पाऊँ मैं

तुम याद करो वादे जो पूरे न किये
मुझे है रंज की अब भी क्यूँ निभाऊँ मैं

ली थी कसम कि तुमको न भूलेंगे कभी
ली थी कसम, तो तुमको कैसे भुलाऊँ मैं