यही बेहतर है की अब तुमको भूल जाऊं मैं,
दिल बेवजह अपना और न दुखाऊँ मैं
मेरे हालात की ख़बर भी न हो तुमको
राज़ कोई दफ़न सीने में हो जाऊं मैं
तेरे ख्यालों के चराग़ हैं दिल में रोशन
बुझा कर वो ख़यालात ख़ुद ही बुझ जाऊं मैं
याद तो सब है, बस याद नहीं करना है
बात हर लम्हा यही ख़ुद को समझाऊँ मैं
कभी तो ताबीर-ए-ख़्वाब मुझपर भी हो
पर क्या करूँ जो रातों को न सो पाऊँ मैं
तुम याद करो वादे जो पूरे न किये
मुझे है रंज की अब भी क्यूँ निभाऊँ मैं
ली थी कसम कि तुमको न भूलेंगे कभी
ली थी कसम, तो तुमको कैसे भुलाऊँ मैं
Kya baat hai. Sare jazbaat utar diye dil ke.
जवाब देंहटाएंshukriya bhai hausla afzayi karne ke liye...
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