शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

क़सक

वो मेरे सामने था मगर किसी चाँद की तरह,
उसे देख तो सकता था मैं, छू सकता न था !

रस्मी ही सही, उसने हाल तो पूछा था,
उसे परवाह नहीं, मैं कह सकता न था !

दिल आज़ारी न कहो, कि सीनारेज़ी थी,
ज़ख्म जो उसने दिए, मैं दिखा सकता न था !

ये वक़्त के ज़ख्म भरने में वक़्त लगेगा,
इतना भी वो मुझको समझा सकता न था...


वो फ़िर मिला मुझे एक अजीब मोड़ पर,
कि जा रहा था वोमैं रोक सकता न था !

सिर्फ़ वो ही नहीं बदला, मेरे भी कुछ वादे थे
'फ़राज़आईने को झुठला सकता न था...

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