वो मेरे सामने था मगर किसी चाँद की तरह,
उसे देख तो सकता था मैं, छू सकता न था !
रस्मी ही सही, उसने
हाल तो पूछा था,
उसे परवाह नहीं, मैं कह सकता न था !
दिल आज़ारी न कहो, कि सीनारेज़ी थी,
ज़ख्म जो उसने दिए, मैं दिखा सकता न था !
ये वक़्त के ज़ख्म भरने में वक़्त लगेगा,
इतना भी वो मुझको समझा सकता न था...
वो फ़िर मिला मुझे एक अजीब मोड़ पर,
कि जा रहा था वो, मैं रोक सकता न था !
सिर्फ़ वो ही नहीं बदला, मेरे
भी कुछ वादे थे
'फ़राज़' आईने को झुठला सकता न था...
Kyaa baat h
जवाब देंहटाएंKya baat h lajwab
Kyaa baat h
जवाब देंहटाएंKya baat h lajwab
shukriya bhai...aap hausla afzayi karte rahe
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