फ़ातिहा सब हो मेरा, ज़ख़्म अभी हरे थे,
वो आये न जनाज़े पर, जिनके लिए मरे थे !
सबकुछ उन्हें पता है, पर हाल पूछते हैं,
लगते हैं अजनबी से, वो जो कभी मेरे थे !
हमको तो डर था ये कि कैसे जियेंगे तन्हा,
उतना नहीं है मुश्किल, जितना कि हम डरे थे !
यूँ तो नहीं हैं बाक़ी, उतने भी ज़ख़्म दिल में,
पर वक़्त के मरहम से सब ज़ख़्म कब भरे थे !
इक हाथ न बढ़ाया मेरी तरफ मदद को,
लोगों के थे बहाने, लोगों के मशवरे थे !
मेरी क़सम की अब तक, तुझपे उधारियाँ हैं,
तू कर हिसाब उनका, वादे वो जो तेरे थे !
दो गज़ कफ़न के पर्दे में छुप गई है इज्ज़त,
मर कर हुए हैं अच्छे, ज़िन्दा थे तो बुरे थे !
इस दौर में मोहब्बत, है जिस्म की ज़रुरत,
जो इश्क़ कर गये थे, वो लोग दूसरे थे !
सारा क़ुसूर न दो 'अल्फ़ाज़' तुम हुस्न को,
हम भी तो इश्क़ में कुछ ज़्यादा ही सर-फिरे थे !
||| अल्फ़ाज़ |||
फ़ातिहा = Recitation Of Certain Suras Of The Holy Qur'aan For The Peace Of Departed Soul.
ज़ख़्म = Wound (घाव)
जनाज़ा = Bier, Funeral (अंत्येष्टि, अंतिम संस्कार)
तन्हा = Lonely, Alone (अकेला)
तरफ़ = Side, Towards (ओर, दिशा)
मदद = Help (सहायता)
बहाना = Excuse, Pretext, Pretence
मशवरे = Suggestion, Advice (सलाह, परामर्श)
क़सम = An Oath (सौगंध)
उधारियाँ = Debts, Debts (ऋण)
कफ़न = Shroud, Cloth To Cover The Corpse
हुस्न = Beauty, Elegance, Comeliness (सुन्दरता, सौंदर्य)
सर-फिरे = Crazy