नींद
से था जागा मगर आँख लगी हो जैसे,
रात
फिर ख़्वाब में मुझको तू मिली हो जैसे !
ख़्वाब
जो टूट गया उसकी तासीर ही कुछ ऐसी थी,
तेरे
आग़ोश में कोई रात कटी हो जैसे !
ख़्वाब
के बोझ से पलकें मेरी यूँ बोझिल हैं,
नींद
फ़िर तेरा पता पूछ रही हो जैसे !
मैंने
दामन तेरा कुछ सोच के फ़िर थाम लिया
कोई
रंजिश कभी तुझसे न रही हो जैसे !
मेरे
हाथों में कुछ देर तलक तेरा हाथ रहा,
ख़्वाब
में ख़्वाब को ताबीर मिली हो जैसे !
मैंने
माना ये हक़ीकत नहीं, महज़ ख्वाब ही था,
एक
लम्हे को तेरी आहट साथ रही हो जैसे !
बारहा
ख़्वाब था, तो टूट ही गया,
मुझसे
तू ख़्वाब में भी रूठ गयी हो जैसे !
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