गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

ख़्वाब

नींद से था जागा मगर आँख लगी हो जैसे,
रात फिर ख़्वाब में मुझको तू मिली हो जैसे !

ख़्वाब जो टूट गया उसकी तासीर ही कुछ ऐसी थी,
तेरे आग़ोश में कोई रात कटी हो जैसे !

ख़्वाब के बोझ से पलकें मेरी यूँ बोझिल हैं,
नींद फ़िर तेरा पता पूछ रही हो जैसे !

मैंने दामन तेरा कुछ सोच के फ़िर थाम लिया
कोई रंजिश कभी तुझसे न रही हो जैसे !

मेरे हाथों में कुछ देर तलक तेरा हाथ रहा,
ख़्वाब में ख़्वाब को ताबीर मिली हो जैसे !

मैंने माना ये हक़ीकत नहीं, महज़ ख्वाब ही था,
एक लम्हे को तेरी आहट साथ रही हो जैसे !

बारहा ख़्वाब था, तो टूट ही गया,
मुझसे तू ख़्वाब में भी रूठ गयी हो जैसे !

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