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सोमवार, 22 जनवरी 2018

नक़्श-ए-क़दम !!!

आँखों से छलक ही जाती है,
ख़ुशियों की ख़बर को क्या कहिये !

पढ़ लेते हैं मेरी ख़ामोशी
अपनों की नज़र को क्या कहिये !

बेफ़िक्र सा कुछ हो जाता हूँ,
बचपन का ज़िक्र को क्या कहिये !

ज़िन्दगी सिमट के रह जाती है,
शहरों में हो घर तो क्या कहिये !

वाक़िफ़ हूँ ख़ुदा के हुक्मों से,
दिल में न हो डर तो क्या कहिये !

हर नक़्श-ए-क़दम पर इबरत है
'फ़राज़' के सफ़र को क्या कहिये !

||| फ़राज़ |||

ख़बर= News
ख़ामोशी= Silence
नज़र= Vision
बेफ़िक्र= Casual, Carefree.
ज़िक्र= Narration, Remembrance, Talk

वाक़िफ़= aware, informed, Acquainted.

हुक्म= Order

नक़्श-ए-क़दम = Footprints.

इबरत= Lesson/ Admonition

सोमवार, 15 जनवरी 2018

ख़ैर-ख़बर

हमने समझा था कि दिल संभल गया होगा,
जाने क्या बात है कि आँख भर आती है !

न पूछ क़िस्सा तू मेरी मोहब्बत का,
चोट सीने की पुरानी सी उभर आती है !

पलकों पे छोड़ जाती है भीगे लम्हें,
दिल में जब यादों की लहर आती है !

माना कि तू मेरा कोई नहीं लगता,
अच्छा लगता है जब ख़ैर-ख़बर आती है !

कि वो क़ुर्बत नहीं, महज़ तिजारत है,
वो मोहब्बत, जो शर्तों पर आती है !

नाख़ुदा का किरदार भी पता चल जाता है,
कश्तियाँ 'फ़राज़' जब बीच भंवर आती हैं !

||| फ़राज़ |||

क़िस्सा= Tale, Story.
ख़ैर-ख़बर= News/ Information of wellness/goodness.
क़ुर्बत= vicinity, nearness.
महज़= Merely, Only
तिजारत= Trade, Commerce.
शर्त= Condition, Term, Stipulation.
नाख़ुदा= Boatman, Sailor, Captain/Commander of the ship.
किरदार= Character.
कश्ती= Boat.
भंवर= whirlpool vertex.

बुधवार, 20 सितंबर 2017

मेरा साया!!!

तू मेरी सूनी आँखों को,
ख़्वाबों से रोज़ सजाता है !
मैले-धुंधले  मेरे मन को,
तू रंगों से भर जाता है !

जब रात अँधेरी घिरते ही,
मेरा साया खो जाता है !
तू चुपके से मन में आकर,
मेरे साया हो जाता है !

तू दूर हैं मेरी आँखों से,
पर दूर कभी न लगता है !
हमदर्द जो बनके आया तू,
आसान सा जीना लगता है !

जाने कैसा मरहम मुझको,
तेरी बातों से मिलता है !
उम्मीद के धागों से मेरे,
मन के ज़ख्मों को सिलता है !

न कोई वादा लेता है,
न शर्त कोई तू रखता है !
न बांधता है तू कसमों में,
न रिश्तों के बंधन रखता है !

तू दोस्त से ज़्यादा अपना है,
तू इश्क़ से ज़्यादा गहरा है !
मैं ख़ुद से ज़्यादा तेरा हूँ,
तू ख़ुद से ज़्यादा मेरा है !

|||फ़राज़|||

शनिवार, 17 जून 2017

अभी ताज़ा है ज़ख्म, थोड़ा अभी सह लेने दो..

अभी ताज़ा है ज़ख्म,
थोड़ा अभी सह लेने दो..
आज मुझे ज़रा देर चुप रह लेने दो..

अभी मैं बिखरा हूँ,  
कुछ वक़्त में सिमट जाऊँगा..
अभी सोया हूँ,
जब जागूँगा तो निखर जाऊँगा..
मेरे हालात से तुम न परेशान होना..
मैं हूँ दरिया,
समंदर नहीं, जो ठहर जाऊँगा..
अभी ताज़ा है ज़ख्म,
थोड़ा अभी सह लेने दो..
आज मुझे ज़रा देर चुप रह लेने दो..

अभी बाक़ी हैं हवास,
कोई बात न मैं समझूंगा..
एक पैमाना और कर दूँ ख़ाली,
तो कुछ समझूंगा..
अभी ज़िन्दगी के कुछ घूँट
भी हैं पीना बाक़ी..
जो कुछ बूँदें ही मिल जाएँ,
तो ग़नीमत समझूंगा..

मुझसे ख़्वाबों में भी तुम
न कोई रिश्ता रखना..
इतना है कहना,
इतना ही बस कह लेने दो..
अभी ताज़ा है ज़ख्म,
थोड़ा अभी सह लेने दो..
आज मुझे ज़रा देर चुप रह लेने दो...

आज भी याद है मुझको
जब तुमने कुछ कहा भी न था..
तुम ही आँखों में,
ख़्वाबों में, मेरी ज़िन्दगी में थे..
आज भी याद हैं ठिकाने
तुमसे मिलने के..
आज भी कानों में
पहली सी सदा आती है..
ये, और कुछ और बातें,
जो अधूरी रह गयीं..
आज फिर ये बातें,
मुझे खुद से कह लेने दो..
अभी ताज़ा है ज़ख्म,
थोड़ा अभी सह लेने दो..
आज मुझे ज़रा देर चुप रह लेने दो...


फ़राज़

गुरुवार, 2 मार्च 2017

वो आँखों से ठग लेता है

वो पंछी मेरी मन बगिया
ख़्वाबों को चुनने आता है !
वो आँखों से ठग लेता है
वो बातों से छू जाता है !

बेरंग सी मेरी हस्ती को
वो रंग नए से देता है !
किरदार से काँटों को चुनकर
मन फूलों सा कर देता है !

वो बेफ़िक्री की बातों से
मेरी फ़िक्रें झुठलाता है !
जब आता है वो इस दिल में
सबकुछ रौशन कर देता है !

वो राह है जैसे जन्नत की
ताउम्र मुसाफ़िर हो जाऊं !
उस राह का जोगी बन जाऊं
ताउम्र मुहाजिर हो जाऊं !

एक बेपरवाह मुस्कान सा वो
अक्सर होठों पर आता है !
वो क़तरा आंसू का बनकर
इन आँखों से बह जाता है !

| फ़राज़ |

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

फ़िर कभी !

तुम ख़्वाब बन के आओ
आँखों में आज रात
इस रात की सुबह को
ढूंढेंगे फ़िर कभी !

बाद मुद्दत उलझा है
तेरी ज़ुल्फ़ से ख़याल,
मेरी उलझनों की गिरहें
खोलेंगे फ़िर कभी !

तू चाँद बनके रात में
आया है फ़लक़ पर,
भर लें तुझे निगाह में
सो लेंगे फ़िर कभी !

बस आज की रात है
कुछ देर ठहर जाओ,
छोड़ जाने का इरादा
कर लेंगे फ़िर कभी !

रह जाओ आग़ोश में ज़रा 
की मिल जाये तसल्ली,
दुश्वारियों का तक़ाज़ा
कर लेंगे फ़िर कभी !

भर लूँ तुझे निगाह में
कल की किसे ख़बर,
इन लम्हों का तजुर्बा
बाँटेंगे फ़िर कभी !

क्या गिला तुझसे करूँ
छोटी सी है ज़िन्दगी,
तेरी नादानियों का शिक़वा
कर लेंगे फ़िर कभी !

|||फ़राज़|||

मुद्दत= A long time, 

गिरहें= A knot, joint, knuckle.
फ़लक़= Sky, Heaven, Firmament.
आग़ोश= Embrace
दुश्वारियों= Difficulties.
तक़ाज़ा= Demand, Pressing Settlement, Urge.
तजुर्बा= Experience.
गिला= Complaint, Reproach
शिक़वा= Complaint


गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

ख़्वाब

नींद से था जागा मगर आँख लगी हो जैसे,
रात फिर ख़्वाब में मुझको तू मिली हो जैसे !

ख़्वाब जो टूट गया उसकी तासीर ही कुछ ऐसी थी,
तेरे आग़ोश में कोई रात कटी हो जैसे !

ख़्वाब के बोझ से पलकें मेरी यूँ बोझिल हैं,
नींद फ़िर तेरा पता पूछ रही हो जैसे !

मैंने दामन तेरा कुछ सोच के फ़िर थाम लिया
कोई रंजिश कभी तुझसे न रही हो जैसे !

मेरे हाथों में कुछ देर तलक तेरा हाथ रहा,
ख़्वाब में ख़्वाब को ताबीर मिली हो जैसे !

मैंने माना ये हक़ीकत नहीं, महज़ ख्वाब ही था,
एक लम्हे को तेरी आहट साथ रही हो जैसे !

बारहा ख़्वाब था, तो टूट ही गया,
मुझसे तू ख़्वाब में भी रूठ गयी हो जैसे !