shiqwa लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
shiqwa लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 28 अक्टूबर 2018

हसरत

पाँवों को फैलाने की फ़ितरत का क्या करूँ,
चादर का नहीं दोषमैं हसरत का क्या करूँ !

ऐ काश भुला पाता तुम्हे मैं भी मुकम्मल,
शिकवे तो भूल जाऊँमोहब्बत का क्या करूँ !

तुमको है यही ज़िद कि भुला दूँ तुम्हें मैं भी,
ख़्वाहिश तो छोड़ दूँ मैं आदत का क्या करूँ !

ज़िद छोड़ दूँ तेरी मगर मसअला है कुछ अलग,
हसरत तो दबा लूँमैं ज़रुरत का क्या करूँ !

अच्छी तरह पहचानता हूँ मैं तेरे मुखौटे,
सीरत तेरी बुरी है तो सूरत का क्या करूँ !

हर इल्ज़ाम गवारा था तेरे इश्क़ में हमको,
तू ही नहीं तो मैं तेरी तोहमत का क्या करूँ !

रुक जायेगा तूने अगर सोचा कभी ऐसा,
मेहनत में न कमी थी मैं क़िस्मत का क्या करूँ !

'अल्फ़ाज़मैं क्या पाउँगा हो कर के जन्नती,
जब यार हों  दोज़ख़ में तो जन्नत का क्या करूँ !

||| अल्फ़ाज़ |||

फ़ितरत= Nature
दोष= Fault, Sin
हसरत= Unfulfilled Desire
मुकम्मल= Complete
शिक़वा= Complaint, Reproach
ख़्वाहिश= Wish, Inclination
मसअला= Problem, Matter,
मुखौटे= Mask
सीरत= Quality, Disposition, Character
इल्ज़ाम= Accusation, Charge, Blame
गवारा= Bearable, Tolerable
तोहमत= Allegation, Accuse
जन्नतीDweller In Paradise
दोज़ख़= Hell

गुरुवार, 23 मार्च 2017

तन्हा !!!

स्याह रात और हवाएं तन्हा,
स्याहियों से उलझी मेरी सदायें तन्हा !
कोई बादलों के पार नहीं रहता शायद,
लौट आती हैं मेरी ख़ामोश दुआएं तन्हा !

अक्सर मेरी ख़ामोशियों में शोर बनके,
चीख़ती रहती हैं मेरी आहें तन्हा !
तेरी राहों से मिले महज़ पांव के छाले,
लौटकर जब आयीं बेज़ार निगाहें तन्हा !

इस रु-ए-ज़मीं तक तुझको तलाश कर,
लौट आयीं मेरी नाकाम निगाहें तन्हा !
न तलब-ए-वफ़ा, न शिक़वा रंजिशों से,
बेकैफ़ सफ़र, बेकैफ़ सी राहें तन्हा !!!

||| फ़राज़ |||

रु-ए-ज़मीं= End of the world
बेकैफ़= = joyless, languid

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

फ़िर कभी !

तुम ख़्वाब बन के आओ
आँखों में आज रात
इस रात की सुबह को
ढूंढेंगे फ़िर कभी !

बाद मुद्दत उलझा है
तेरी ज़ुल्फ़ से ख़याल,
मेरी उलझनों की गिरहें
खोलेंगे फ़िर कभी !

तू चाँद बनके रात में
आया है फ़लक़ पर,
भर लें तुझे निगाह में
सो लेंगे फ़िर कभी !

बस आज की रात है
कुछ देर ठहर जाओ,
छोड़ जाने का इरादा
कर लेंगे फ़िर कभी !

रह जाओ आग़ोश में ज़रा 
की मिल जाये तसल्ली,
दुश्वारियों का तक़ाज़ा
कर लेंगे फ़िर कभी !

भर लूँ तुझे निगाह में
कल की किसे ख़बर,
इन लम्हों का तजुर्बा
बाँटेंगे फ़िर कभी !

क्या गिला तुझसे करूँ
छोटी सी है ज़िन्दगी,
तेरी नादानियों का शिक़वा
कर लेंगे फ़िर कभी !

|||फ़राज़|||

मुद्दत= A long time, 

गिरहें= A knot, joint, knuckle.
फ़लक़= Sky, Heaven, Firmament.
आग़ोश= Embrace
दुश्वारियों= Difficulties.
तक़ाज़ा= Demand, Pressing Settlement, Urge.
तजुर्बा= Experience.
गिला= Complaint, Reproach
शिक़वा= Complaint