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गुरुवार, 23 मार्च 2017

तन्हा !!!

स्याह रात और हवाएं तन्हा,
स्याहियों से उलझी मेरी सदायें तन्हा !
कोई बादलों के पार नहीं रहता शायद,
लौट आती हैं मेरी ख़ामोश दुआएं तन्हा !

अक्सर मेरी ख़ामोशियों में शोर बनके,
चीख़ती रहती हैं मेरी आहें तन्हा !
तेरी राहों से मिले महज़ पांव के छाले,
लौटकर जब आयीं बेज़ार निगाहें तन्हा !

इस रु-ए-ज़मीं तक तुझको तलाश कर,
लौट आयीं मेरी नाकाम निगाहें तन्हा !
न तलब-ए-वफ़ा, न शिक़वा रंजिशों से,
बेकैफ़ सफ़र, बेकैफ़ सी राहें तन्हा !!!

||| फ़राज़ |||

रु-ए-ज़मीं= End of the world
बेकैफ़= = joyless, languid