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रविवार, 16 सितंबर 2018

काँटों की तरह

हम ख़ुद से क्यूँ बे-ज़ार हैं काँटों की तरह,
हम ख़ुद में ही हथियार हैं काँटों की तरह !

उस गुल से वफ़ा का तक़ाज़ा नहीं करते,
हम जिसके पहरेदार हैं काँटों की तरह !

फूलों की तरह डर नहीं मुरझाने का हमें,
हम तो सदाबहार हैं काँटों की तरह !

शाख़ों से कोई हमको जुदा कर नहीं सकता,
ता-उम्र वफ़ादार हैं काँटों की तरह !

रंग-ओ-बू से गुल की हमको कोई नहीं ग़रज़,
हम बे-सरोकार हैं काँटों की तरह !

गुलशन की रिवायत से शिकायत नहीं हमें,
मुक़द्दर के हम शिकार हैं काँटों की तरह !

फूलों की तरह बिकते नहीं हम बाज़ार में,
-ज़िद-ओ-बा-वक़ार हैं काँटों की तरह !

चुभते हैं तो चुभेंगे ता-ज़िन्दगी तुम्हें,
हम साहिब-ए-किरदार हैं काँटों की तरह !

कीमत मेरे हुनर कीन दे सका ज़माना,
‘फ़राज़’ बे-ख़रीदार हैं काँटों की तरह !
           
||| फ़राज़ |||

बेज़ार= To Be Sick Of
हथियार= Weapon, Arms
गुल= Flower
वफ़ा= Fidelity, Faithfulness
तक़ाज़ा= Demand, Urge
पहरेदार= Watchman,  Guard
शाख़= Branch, Bough,
ता-उम्र= Lifelong
वफ़ादारFaithful, Loyal
सदाबहार= Evergreen
रंग-ओ-बूColor And Fragrance
ग़रज़Intention, Object
बे-सरोकार = Unconcerned
गुलशन= Flower Garden
रिवायत= Tradition, Custom
शिकायत= Complaint
मुक़द्दर= Destiny
शिकार= Victim
बाज़ार= Market
बज़िद= Persistent, Obstinate
बा-वक़ार= Honored, Prestigious, Reputed
ता-ज़िन्दगी= Lifelong
साहिब-ए-किरदार= Man Of Character
ज़माना= The World, Era, Time
बे-ख़रीदार= Without Customer

शनिवार, 28 अप्रैल 2018

!!! दिल-ए-मोमिन !!!

सवाल ही सवाल रहे, कोई जवाब न रहे,
मेरी नींदों में बाक़ी कोई ख़्वाब न रहे !

ये बस्ती तेरे बग़ैर कुछ ऐसी लगती है,
जैसे गुलशन में बाक़ी कोई गुलाब न रहे !

इतना बेज़ार सा है ये दिल-ए-मोमिन मेरा,
जैसे इबादत में बाक़ी कोई सवाब न रहे !

चाहे कुछ न कमा पाऊं मैं जन्नत की ख़ातिर,
मगर ज़िन्दगी पे बाक़ी कोई हिसाब न रहे !

मुफ़्लिसी इतनी भी पेश न आये कभी दिल को,
कि निगाहों में बाक़ी कोई सराब न रहे !

इतना ख़ाली है मेरा दिल तेरी याद के बग़ैर,
जैसे मय-ख़ाने में बाक़ी कोई शराब न रहे !

कि फ़िर कौन याद करेगा अल्लाह को तड़पकर,
अगर ज़िन्दगी में बाक़ी कोई अज़ाब न रहे !

ज़रूरी है कि नज़र और नज़रिया ठीक हो,
चाहे औरत पे बाक़ी कोई हिजाब न रहे !

ख़ुदारा 'फ़राज़' को तू इतना मुकम्मल कर दे,
कि मेरे किरदार पे बाक़ी कोई नक़ाब न रहे !

||| फ़राज़ |||

बग़ैर= Without, Except
गुलशन= Flower Garden, Rose Garden
बेज़ार= To Be Sick Of
दिल-ए-मोमिन= Believer/ Pious
इबादत= Prayers, Adoration
सवाब= Reward Of Good Deeds
ख़ातिर= For The Sake Of
हिसाब= Account, Calculation
मुफ़्लिसी= Poverty
पेश= Happen
सराब= Mirage, Illusion
मय-ख़ाना= Bar, Tavern
अज़ाब= Torment, Agony
नज़रिया= Ideology, Perspective
हिजाब= Hijaab Means A Cover Of A Woman Over The Whole Body.
ख़ुदारा=  O God.
मुकम्मल= Complete, Perfect
किरदार= Character
नक़ाब= Is The Covering Of The Face And Hands.

गुरुवार, 23 मार्च 2017

तन्हा !!!

स्याह रात और हवाएं तन्हा,
स्याहियों से उलझी मेरी सदायें तन्हा !
कोई बादलों के पार नहीं रहता शायद,
लौट आती हैं मेरी ख़ामोश दुआएं तन्हा !

अक्सर मेरी ख़ामोशियों में शोर बनके,
चीख़ती रहती हैं मेरी आहें तन्हा !
तेरी राहों से मिले महज़ पांव के छाले,
लौटकर जब आयीं बेज़ार निगाहें तन्हा !

इस रु-ए-ज़मीं तक तुझको तलाश कर,
लौट आयीं मेरी नाकाम निगाहें तन्हा !
न तलब-ए-वफ़ा, न शिक़वा रंजिशों से,
बेकैफ़ सफ़र, बेकैफ़ सी राहें तन्हा !!!

||| फ़राज़ |||

रु-ए-ज़मीं= End of the world
बेकैफ़= = joyless, languid

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

जब वो मनाने आया

वो आज अपनी कहानी सुनाने आया,
पथरायी आँखों को पानी बनाने आया !

कोई वादा न कोई कसम निभाने आया,
वो जब भी आया तो छोड़ जाने आया !

एक आस के सहारे हम जिंदा थे अब तलक,
वो आया भी तो क़दमों के निशान मिटाने आया !

रोज़ जलाता हूँ मैं ख़्वाब अँधेरा मिटाने के लिए,
मेरे जलते ख़्वाबों को वो कभी ना बुझाने आया !

फ़िर एक तमन्ना की, फ़िर बेज़ार हो गए,
वो फ़िर से आया तो मुझे छोड़ जाने आया !

शायद उसने आने में बहुत देर लगा दी होगी,
कोई रिश्ता न बचा था जब वो मनाने आया !

फ़राज़.....

रविवार, 27 नवंबर 2016

सिलसिला

अहसास फ़िर एक दबा सा ढूंढ लिया,
दिल ने दर्द का फ़िर पता ढूंढ लिया !

बेज़ार हो चला था दिल सुकूनियत से,
दिल आज़ारी का फ़िर मरहला ढूंढ लिया !

एक उम्र तलक रहे हैं आवारगी के दिन,
थके हुए क़दमों ने फ़िर आशियाँ ढूंढ लिया !

उससे शिक़ायत क्या करूँ की ग़ैर है वो,
ख़ुद से ही आज फ़िर गिला ढूंढ लिया !

अहसासों को तलाश थी अल्फ़ाज़ों की,
फिर से एक राज़ छुपा सा ढूंढ लिया !

सब इल्ज़ाम मैंने अपने नाम कर लिए,
पर तू न मिला, मैंने बेइन्तेहा ढूंढ लिया !

मेरे तू ख़्वाबों में भी ख़्वाब हो गया,
रतजगों का मैंने सिलसिला ढूंढ लिया !