रविवार, 27 नवंबर 2016

सिलसिला

अहसास फ़िर एक दबा सा ढूंढ लिया,
दिल ने दर्द का फ़िर पता ढूंढ लिया !

बेज़ार हो चला था दिल सुकूनियत से,
दिल आज़ारी का फ़िर मरहला ढूंढ लिया !

एक उम्र तलक रहे हैं आवारगी के दिन,
थके हुए क़दमों ने फ़िर आशियाँ ढूंढ लिया !

उससे शिक़ायत क्या करूँ की ग़ैर है वो,
ख़ुद से ही आज फ़िर गिला ढूंढ लिया !

अहसासों को तलाश थी अल्फ़ाज़ों की,
फिर से एक राज़ छुपा सा ढूंढ लिया !

सब इल्ज़ाम मैंने अपने नाम कर लिए,
पर तू न मिला, मैंने बेइन्तेहा ढूंढ लिया !

मेरे तू ख़्वाबों में भी ख़्वाब हो गया,
रतजगों का मैंने सिलसिला ढूंढ लिया !

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